गांवों के विकास को गति देने और ग्रमीणों को रोजगार मुहैया कराने के लिए चल रही मनरेगा का हाल नाम बड़े और दर्शन थोड़े जैसा है। वित्तीय वर्ष 2014-15 के नौ महीने बीत चुके हैं लेकिन निर्धारित लक्ष्य के सापेक्ष 50 फीसदी बजट भी खर्च नहीं हो सका है। रोजगार की गारंटी देने के दावे भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। यही वजह है कि अफसर भी कागजी कोरम पूरा करने में जुटे हैं।
जनपद के आठ विकास खंडों की 441 ग्राम पंचायतों में इस वर्ष 35 करोड़ 91 लाख रुपये के विकास कार्य मनरेगा से कराने के लिए लेबर बजट मंजूर हुआ था। 12 में से अब तक 9 महीने बीत चुके हैं, लेकिन मात्र 14 करोड़ 59 लाख रुपया ही नौ महीने में जिले की सरकारी मशीनरी खर्च कर सकी है।
बीते तीन महीने में शेष धनराशि खर्च हो पाने के आसार नहीं हैं। सौ दिन का रोजगार देने की गारंटी भी खोखली साबित हो रही है। विकास भवन के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर तक मात्र 133 लोगों को ही सौ दिन का रोजगार मिल सका था।
अब तक मनरेगा के तहत जाबकार्ड धारक 44 हजार 88 लोगों ने काम मांगा है। इसके सापेक्ष 31 हजार 507 लोगों को ही रोजगार मुहैया कराया जा सका है। यानि काम मांगने वाले शत-प्रतिशत लोगों को काम करने का अवसर देने के मामले में भी मनरेगा दावों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पा रही है।
राजस्व और विकास विभाग के कर्मचारियों के बीच तालमेल की कमी ने मनरेगा का बेड़ा गर्क कर दिया है। कार्रवाई के नाम पर नोटिसें जारी करके विकास विभाग के अफसर चुप बैठ जाते हैं।
किसी को नहीं मनरेगा की सुध
मनरेगा की सुध कोई भी राजनैतिक दल नहीं ले रहा है। चाहें केंद्र में सत्ता संभाले बीजेपी हो या उत्तर प्रदेश पर राज क रही समाजवादी पार्टी, दोनों ही दलों के नेता खामोश हैं। वहीं बसपा, कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल भी मनरेगा में तेजी लाने के लिए न तो कभी ज्ञापन देते नजर आते हैं और न ही प्रदर्शन करने की जरूरत समझ रहे हैं। राजनैतिक स्तर से ठोस आवाज न उठने के कारण अहिस्ता-अहिस्ता मनरेगा की हालत बदतर होती जा रही है।
पांच साल में घट गया लेबर बजट
ॎ आम तौर पर विकास योजनाओं के लिए बजट साल-दर साल बढ़ता जा रहा है लेकिन मनरेगा के साथ उल्टा हुआ है। पांच साल पहले मनरेगा का लेबर बजट कन्नौज जनपद में 70 करोड़ रुपये से ज्यादा मंजूर होता था, जो चालू वित्तीय वर्ष में घटते-घटते 35 करोड़ पर आ पहुंचा। इसकी वजह लेबर बजट के सापेक्ष लगातार धनराशि का खर्च न होना माना जा रहा है।
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सुस्ती के कुछ खास कारण
ॎ लेखपालों और सचिवों के बीच खींचतान मची है। अक्सर चकरोड, नाली आदि की पैमाइश के दौरान एक राय नहीं बन पाती है। जब लेखपाल के पास समय होता है तो सचिव नदारद हो जाते हैं और जब सचिव पहुंचते हैं तो लेखपाल गायब हो जाते हैं। तहसील प्रशासन व ब्लाक प्रशासन अपने कर्मचारियों पर शिकंजा कसने के बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण कर पल्ला झाड़ लेते हैं।
ॎ मनरेगा के प्रति ग्राम प्रधान रुचि नहीं ले रहे हैं। ज्यादातर प्रधान जिस गांव में रहते हैं वहीं पर काम करा चुके हैं, जबकि मजरों की तरफ ध्यान नहीं दे रहे। जिला पंचायत राज विभाग की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई न होने के कारण काम न करने वाले प्रधान बेलगाम होकर सुस्ती बरत रहे हैं।
ॎ मनरेगा में तेजी से काम कराने की जिम्मेदारी बीडीओ के कंधों पर है जो फील्ड वर्क से कन्नी काटते हैं। ज्यादातर ब्लाकों के बीडीओ दफ्तरों में बैठकर ही सचिवों व रोजगार सेवकों को बुलाकर बैठकों में लंबे-चौड़े निर्देश देते हैं लेकिन गांव में जाकर काम का जायजा नहीं लेते हैं। बीडीओ की आरामतलबी से फील्ड स्टाफ भी खूब कामचोरी करता है। काम कम होने पर बहानेबाजी करके अफसरों को गुमराह कर देते हैं।
ॎ एपीओ समेत कई संविदा कर्मी विकास विभाग के कर्मचारियों के रिश्तेदार व करीबी हैं। इनके खिलाफ स्थानांतरण से लेकर अन्य किसी प्रकार की कार्रवाई न होने से कर्मचारियों में असंतोष फैल रहा है।
मनरेगा की लगातार समीक्षा चल रही है। प्रधानों, सचिवों, रोजगार सेवकों से लेकर बीडीओ के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जा रहा है। कई प्रधानों को वित्तीय पावर सीज करने, सचिवों का वेतन रोकने तो रोजगार सेवकों की सेवा समाप्ति के लिए लिखापढ़ी शुरू कराई है। जल्द मनरेगा में तेजी दिखेगी।
सीडीओ उदयराज यादव