सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए राजनीतिक पार्टियां सक्रिय हो गई हैं। इसके लिए आईटी एक्सपर्ट की नियुक्तियां की गई हैं। सभी राजनैतिक दल जितना विश्वास अपनी जमीनी टीम पर कर रही हैं, उतना ही चुनाव कार्यालय के वार रूम में बैठे महारथियों पर भी किया जा रहा है।
भाजपा अटल आईटी सेल को चुनाव से पहले ही उतार चुकी है। मैसेंजर के माध्यम से वाट्सअप, ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से प्रचार में जुटे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो लोकसभा चुनाव (2014) जीत के मुहाने तक ले जाने में सोशल मीडिया का अहम रोल था। यही कारण है कि भाजपा भी सोशल मीडिया के माध्यम से पूरी ताकत झोंक देना चाहती है। सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की ओर से चलाई गई योजनाओं को तथ्यों के साथ रखा जा रहा है और इसके साथ ही यूपी सरकार को केंद्र सरकार ने कितना पैसा विकास के लिए भेजा है। उन योजनाओं के बारे में भी बताया जा रहा है।
समाजवादी पार्टी की फ्रंटल इकाई भी सोशल मीडिया पर छाई है। समाजवादी पार्टी के कार्यालय से तीनों विधानसभा के प्रचार और अभी तक के विकास कार्यों को आधार बनाया गया है। कन्नौज में खासकर सपाई सीएम अखिलेश यादव की कर्मभूमि और उनके कन्नौज के प्रति लगाव की बातें सुनाकर लोगों को सपा की ओर खींचने का प्रयास कर रहे हैं।
वहीं, बसपा ने सोशल मीडिया पर अपने योद्धा तैयार कर दिए हैं। बसपा के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर अपने पारंपरिक वोट को पक्का करने में जुटे हैं। वहीं सोशल मीडिया पर वह यूपी सरकार के दौरान हुई घटनाओं का जिक्र करते बदहाल कानून व्यवस्था और अपने पूर्व के शासनकाल की कानून व्यवस्थाओं का जिक्र करने में लगे हैं।
निर्दलीय भी अपना प्रचार करने के लिए सभी को लूट खसोट करने वाला बता एक बार मौका देने की बात कह रहे हैं। कन्नौज सदर में एक निर्दलीय प्रत्याशी अपनेे को गरीब घर का बेटा बता वोट मांग रहा है।