हम भी दरिया हैं, हमें भी अपना हुनर मालूम है। चल पड़ेंगे जिस तरफ रास्ता हो जाएगा। मकबूल शायर डा. बशीर बद्र का यह शेर सियासत में मुस्लिम वोटरों की ताकत बयां करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। वह इसलिए क्योंकि मुस्लिम वोट हमेशा एकतरफा पड़ते रहे है। ऐसा माना जाता है कि मुस्लिम वोटरों का मुख्य एजेंडा भाजपा को शिकस्त देना होता है। पर इस बार हुए विधानसभा चुनाव में कन्नौज की तीनों विधानसभा सीटों पर ऐसा नहीं देखने को मिला। मुस्लिम वोटरों का सबसे अधिक विभाजन छिबरामऊ सीट पर नजर आया, जबकि कन्नौज व तिर्वा में विभाजन कम दिखा।
छिबरामऊ सीट पर बसपा से मुस्लिम चेहरा होने के नाते अधिकतर क्षेत्रों में मुस्लिम वोटरों में विभाजन होता दिखा। हालांकि कई क्षेत्र ऐसे भी रहे जहां पर साइकिल ने रफ्तार पकड़ी। कन्नौज विधानसभा में मुस्लिम मतदाता अधिकतर जगहों पर अपने पुराने एजेंडे पर ही कायम दिखा। जबकि तिर्वा विधानसभा सीट पर मिलाजुला असर देखने को मिला। कन्नौज की तोनों विधानसभा सीटों पर हुए अब तक चुनाव में कोई मुस्लिम चेहरा विधानसभा तक नहीं पहुंच पाया है। हालांकि कमालगंज आंशिक से छिबरामऊ सीट से दूसरी बार अपनी किस्मत अजमा रहे ताहिर हुसैन सिद्दीकी विधायक चुने जा चुके है।