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अब सोयाबीन की खेती में किस्मत आजमा रहे किसान

Sat, 12 Oct 2019 12:27 AM IST
कानपुर ब्यूरो यूपी डेस्क, अमर उजाला, कन्नौज
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मानीमऊ में सोयाबीन के खेत में खड़े किसान निर्भय सिंह। - फोटो : KANNAUJ
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कन्नौज/मानीमऊ। खेती के तरीकों के साथ फसलों के चयन में भी किसान सावधानी बरत रहे हैं। धान और मक्का की परंपरागत फसलों से हटकर मानीमऊ क्षेत्र के किसानों ने सोयाबीन की फसल पर हाथ आजमाया है। यह फसल ज्यादा मुनाफा तो देगी ही, अन्ना मवेशियों से भी खतरा नहीं है। किसानों ने मध्य प्रदेश से बीज लाकर बुआई की थी। अब फसल लगभग तैयार है।
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इलाके के उदैतापुर के किसान निर्भय सिंह ने 30 बीघा खेत में सोयाबीन की फसल बोई है। वहीं शिवनाथ सिंह भदौरिया ने 10 बीघा, चंदन दुबे ने पांच बीघा तो अभिजीत सिंह ने चार बीघा में सोयाबीन फसल की बुआई की है।

इनके अलावा करीब एक दर्जन से अधिक छोटे काश्तकारों ने बरसाती मक्का से मुंह मोड़कर सोयाबीन की फसल बोई है। किसानों ने मध्य प्रदेश के खरगोन से 60 रुपये किलो के हिसाब से बीज लाकर जुलाई के दूसरे सप्ताह में सोयाबीन की बुआई की थी।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीके कनौजिया ने बताया कि खरीफ के मौसम की फसल होने के कारण सामान्यत: सोयाबीन को सिंचाई की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितंबर माह में खेत में नमी पर्याप्त न हो तो आवश्यकतानुसार एक या दो हल्की सिंचाई करना फायदेमंद होता है। अधिकांश पत्तियों के सूख कर झड़ जाने पर और 10 प्रतिशत फलियों के सूख कर भूरी हो जाने पर फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। फसल 80 दिन में तैयारी होती है।
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एक बीघा में मक्का से करीब दो हजार रुपये ज्यादा मुनाफा
मानीमऊ। किसानों के मुताबिक मक्का की एक बीघा फसल पर करीब आठ हजार रुपये मिलते हैं। सोयाबीन की फसल से 10 हजार की आमदनी होगी। एक बीघा में करीब तीन क्विंटल सोयाबीन होती है। इसका समर्थन मूल्य 3710 रुपये प्रति क्विंटल है। मक्का का समर्थन मूल्य 1750 रुपये प्रति क्विंटल है। मक्का के मुकाबले प्रति बीघा सोयाबीन की पैदावार कम होती है।

खरपतवार नियंत्रण
मानीमऊ। कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीके कनौजिया ने बताया कि फसल के प्रारंभिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण जरू री होता है। डोरा या कोल्पा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें। दूसरी निराई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करनी होती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए डोरा या कोल्पा चलाया जाना बेहतर है। खेत में पलवार से सतह से नमी की हानि रुक जाती है। मिट्टी में वायु संचरण भी अच्छा हो जाता है। यह जड़ों के विकास, वृद्धि व पोषक तत्वों के शोषण के लिए महत्वपूर्ण है।
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