कीनू के पौधों में जल्दी सिंचाई की जरूरत नहीं होती। विकास पूनिया ने बताया कि अब इस जमीन में कीनू के पौधों के साथ - साथ मौसमी फसलें गेहूं, सरसों, ग्वार बाजरा व कपास नरमे की खेती भी करता है। कीनू के बाग से उसे पहले 25 लाख रुपये सालाना अतिरिक्त आमदनी होने लगी है। उसने बताया कि सरकार के सहयोग से उसने खेत में एक पानी की डिग्गी भी बना ली है। उस डिग्गी में पानी इकट्ठा करके रखता है।
जब भी सिंचाई की जरूरत होती है तभी कीनू के पौधों व फसलों मे सिंचाई कर लेता है। वह सिंचाई ड्रिप सिस्टम द्वारा की जाती है, जिससे पानी व खाद व दवाई सीधे पौधों को मिल जाती है तथा पानी बेकार नहीं जाता। आस पड़ोस के किसानों को जब भी सिंचाई के पानी की जरूरत नहीं होती तो वह उन किसानों से किराए पर पानी लेकर डिग्गी भर लेता है।
विकास पूनिया ने बताया कि उसके बाग को देखकर गांव के कई किसानों ने भी कीनू के बाग लगाकर कमाई शुरू कर दी है। पास लगते कई गांवों के किसान कीनू का बाग देखने के लिए आते हैं और परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त कमाई का जरिया देखकर खुश होते हैं। विकास ने बताया कि वह सब्जियां अपने खेत में ही उगाता है, कभी भी बाजार से नहीं लाता।
मंडी दूर होने के कारण यातायात खर्च ज्यादा हो जाता है
विकास पूनिया ने बताया कि उसके गांव से सिरसा मंडी दूर पड़ती है जिससे फलों को वहां ले जाकर बेचने में यातायात खर्च ज्यादा आता है तथा बचत कम होती है। उसका कहना है कि अगर फलों की मंडी या फ्रूट प्रोसेसिंग प्लांट नाथूसरी चोपटा में विकसित हो जाए तो यातायात खर्च कम होने से बचत ज्यादा हो जाएगी।