अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। कुनबे पर कर्ज का बोझ था। वह कर्ज उतारने के लिए गांव से 1912 किमी दूर जाकर मजदूरी करने लगा। तीन महीने तक हाड़तोड़ मेहनत करके जब हाथ में 30 हजार रुपये जमा हुए तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। घर वालों को फोन करके बता दिया कि चिंता मत करो, आकर सारा कर्ज चुकता कर दूंगा, लेकिन उसे क्या पता था कि वह घर पहुंच ही नहीं पाएगा। चंडीगढ़ कर्नाटक संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में सफर कर रहे इस युवक की मौत की कहानी कुछ ऐसी ही है। वह मजदूरी करके कमाए 30 हजार रुपये लेकर कुनबे का कर्ज उतारने जा रहा था, लेकिन ट्रेन में उसकी मौत हो गई। झांसी में शव को उतारा गया। यहां से एंबुलेंस ने शव को उसके घर तक पहुंचाने के लिए 40 हजार रुपये मांगे। ऐसे में उसके परिजनों पर 10 हजार का कर्ज और चढ़ गया।
बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के भैरोगंज निवासी परविंद उरांव (40) के परिवार पर काफी कर्ज हो गया था। गांव और आसपास मजदूरी करके वह इतना नहीं कमा पा रहा था कि कर्ज का बोझ उतार सके। इसलिए नवंबर में वह गांव के 16-17 लोगों के साथ मजदूरी करने कर्नाटक के बेलगांव गया था। यहां उसने तीन महीने तक मजदूरी करके 30 हजार रुपये जमा किए। बीते शनिवार को वह अपने साथियों के साथ चंडीगढ़ कर्नाटक संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से वापस गांव लौट रहा था। ट्रेन में परविंद बार-बार अपने साथियों से यही बोल रहा था कि घर पहुंचकर कर्ज चुकता करूंगा। घरवालों को भी फोन पर बता दिया था कि अब कर्ज नहीं रहेगा। घर वाले भी उसका बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
परविंद के फूफा महेंद्र ने बताया कि रात तकरीबन ढाई बजे परविंद ने भोपाल स्टेशन पर पानी पीया। इसके बाद उसने ठंड लगने की बात कही तो उन्होंने अपनी जैकेट ओढ़ा दी। झांसी से ट्रेन बदलनी थी। सुबह पांच बजे ट्रेन झांसी पहुंची तो परविंद को उठाया, लेकिन उसकी सांसें थम चुकी थीं। परविंद की मौत की सूचना पर पहुंची जीआरपी ने शव को ट्रेन से उतरवाया। मृतक के साथी रवि ने बताया कि परविंद के शव को एंबुलेंस से झांसी से बिहार के पश्चिमी चंपारण ले जाने के लिए चालक ने 40 हजार रुपये मांगें। अब उसके परिजनों पर 10 हजार रुपये का कर्ज और चढ़ गया। युवक की मौत के बाद परिजनों का बुरा हाल है।