झांसी। आजकल के लेखक गंभीर नहीं हैं, इसलिए पाठक भी गंभीर नहीं हैं। इसी वजह से किताबों की बिक्री भी कम हो गई है। लिखने के बाद लेखक सोचता है कि अगले ही दिन उसकी किताब छप जाए। लिखे हुए को तराशते नहीं है। जबकि, ये ठीक नहीं है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बुंदेलखंड साहित्य महोत्सव के दौरान ये बात अमर उजाला से बातचीत में लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कही।
उन्होंने कहा कि पहले युवा किताबें पढ़ते थे मगर आजकल उनका सारा समय टीवी और मोबाइल पर ही बीत जाता है। सोशल मीडिया पर घंटों बिताने की वजह से साहित्य के प्रति युवाओं का रुझान घट गया है। युवा अब गहराई से नहीं सोचता है। वो जीवन के मूल्य भी भूलते जा रहे हैं, क्योंकि साहित्य ही जीवन का मूल्य सिखाता है। थोड़ा सा पढ़ने से ही व्यक्ति में चेतना होती है। बुंदेलखंड की साहित्यिक विभूतियों और कृतियों को कैसे नई पीढ़ी जानेगी के सवाल पर बोलीं कि यहां के साहित्यकार ही इस पर चर्चा नहीं करते हैं। क्योंकि, साहित्य में ईर्ष्या और द्वेष बहुत फैला है। जबकि, बिहार के साहित्यकार एक-दूसरे की रचनाओं को खूब प्रोत्साहित करते हैं। साहित्य को लेकर पाठक सबसे ज्यादा ईमानदार है। जबकि, साहित्यकार एक-दूसरे के लिए ईमानदार नहीं हैं। साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने के सवाल पर बोलीं कि ये तो नाटक था। उन साहित्यकारों ने मोमेंटो लौटाया राशि नहीं। इससे हम प्रभावित नहीं हुए, बल्कि बहुत दुख पहुंचा। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से जाने-माने बुंदेलखंड समेत अन्य क्षेत्रों के साहित्यकारों की कृतियों को हटाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि चयन के लिए जो कमेटी होती है, उसे साहित्य से नहीं बल्कि व्यक्ति से मतलब होता है।