झांसी। माक्रेटिंग का एक सूत्र है, जो दिखता है, वो बिकता है। विश्व पर्यटन के बाजार में पर्यटन विभाग झांसी के ऐतिहासिक व रमणीक स्थलों को दिखा नहीं पा रहा है। यही वजह है कि यहां तमाम संभावनाएं होने के बाद भी पर्यटन उद्योग का विकास नहीं हो पा रहा है।
ओरछा और खजुराहो जाने वाले अधिकांश देसी, विदेशी पर्यटक झांसी से होकर ही जाते हैं। प्रचार प्रसार के अभाव में वह झांसी में नहीं रुक पा रहे हैं। पूर्व में पर्यटन विभाग ने योजना बनाई थी कि विभिन्न स्थानों को होर्डिंग लगाकर पर्यटकों को झांसी में रोका जाएगा, लेकिन इस योजना पर अभी तक काम नहीं हो सका है।
पर्यटन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि महानगर में विदेशी पर्यटकों के आने की संख्या निरंतर कम हो रही है। झांसी किला में वर्ष 2013 में 543 व रानी महल 42 विदेशी पर्यटक आए थे। वर्ष 2014 में किला में 567 व रानी महल में 31 विदेशी पर्यटक आए। वर्ष 2015 में अगस्त माह तक किला में 367 तथा रानी महल में मात्र 19 विदेशी पर्यटक आए। वहीं इस दौरान भारतीय पर्यटकों की संख्या लगभग सात लाख से अधिक रही है। गौरतलब है कि झांसी एवं रानी महल में भारतीय नागरिक को पांच रुपये व विदेशी नागरिक को सौ रुपये प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क देना होता है।
यह हैं ऐतिहासिक पर्यटक स्थल
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दीपशिखा वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की नगरी में ऐतिहासिक स्मारकों की कमी नहीं है। रानी का किला, किले में प्राचीन गणेश व शिव मंदिर, कड़क बिजली तोप, भवानी शंकर तोप, गुलाम गौस खां, काल कोठरी, फांसी स्तंभ आदि दर्शनीय स्थल हैं। रानी महल भी झांसी की रानी की यादों को संजोए हुए है। गुसाइयों के मंदिर भी यहां की पुरातात्विक कला को प्रदर्शित करते हैं। राजा रामचंद्र राव की छतरी, राजा गंगाधर राव की समाधि, लक्ष्मी मंदिर, राजा रघुनाथ राव का महल प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।
नगर से 22 किलो मीटर दूर लघु पहाड़ी पर बरुआसागर का किला और उसके चारों ओर परकोटे में नौ बुर्ज व मध्य में तीस मीटर ऊंचा राजमहल है। पास में ही जराय का मठ प्रतिहार काल का अद्भुत कला का संग्रह है। झांसी-ललितपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बबीना से करीब नौ किलोमीटर दूर बेतवा नदी पर सुकवां-ढुकवां बांध सैलानियों को आकर्षित करता है। बांध के एक से दूसरे छोर पर जाने के लिए करीब एक किलोमीटर लंबी सुरंग है, जिसमें वृत्ताकार मेहराबदार खिड़कियां हैं।