जिले के चारों विधानसभा क्षेत्रों में मतदान के मामले में सबसे खराब स्थिति झांसी क्षेत्र की है। इसका अंदाजा पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों को देखकर लगाया जा सकता है, जिनमें जनपद की अन्य तीनों ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों के मुकाबले झांसी में सबसे कम मतदान प्रतिशत रहा है।
घर की बैठक हो या गली का नुक्कड़, इन दिनों सभी जगह चुनाव की चर्चाएं जोरों पर हैं। कमोबेश हर चुनाव से पहले शहर की यही स्थिति बनी रहती है। इसके अलावा विभिन्न दलों के बड़े नेता भी झांसी विधानसभा क्षेत्र में ही अपने दौरे करते हैं। कुल मिलाकर चुनाव के दौरान झांसी विधानसभा क्षेत्र में राजनीति का पारा आसमान पर रहता है। लोग दलों में बंटे नजर आते हैं। लेकिन, राजनीति की यह समझ मतदान के दिन दिखाई नहीं देती। इसका अंदाजा विधानसभा के पिछले तीन चुनावों के मतदान प्रतिशत को देखकर लगाया जा सकता है। 2002 और 2007 के चुनावों में सर्वाधिक मतदान गरौठा में हुआ था और सबसे कम झांसी में। 2012 के चुनाव में सर्वाधिक मतदान बबीना में और सबसे कम झांसी विधानसभा क्षेत्र में हुआ था।
पिछले तीन चुनावों में मतदान की स्थिति
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विधानसभा 2002 2007 2012
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गरौठा 63.15 49.38 66.11
बबीना 57.52 44.71 68.78
मऊरानीपुर 57.06 48.16 64.69
झांसी 44.14 34.96 57.03
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सबसे ज्यादा शिक्षित लोग झांसी में
जिले के चारों विधानसभा क्षेत्रों में सर्वाधिक शिक्षित लोग झांसी में हैं। झांसी विधानसभा क्षेत्र में साक्षरता का प्रतिशत 75.05 है। जबकि, गरौठा विधानसभा क्षेत्र में साक्षरता दर 73.28, मऊरानीपुर में 68.87 और बबीना विधानसभा क्षेत्र में साक्षरता दर 67.34 फीसदी है।
मतदान की दिलाई जा रही शपथ
मतदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से अमर उजाला द्वारा शत प्रतिशत मतदान अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत कालेजों में शिक्षकों व छात्र-छात्राओं को शत प्रतिशत मतदान की शपथ दिलाई जा रही है। इसके अलावा निर्वाचन आयोग की ओर से भी तमाम जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
ग्रामीणों को राजनीति से उम्मीद
शहरी क्षेत्र के लोगों की अपेक्षा ग्रामीण आबादी राजनीति से भारी उम्मीद रखती है। कानून व्यवस्था की समस्या हो या पानी का प्रबंध, ग्रामीण नेताओं से उम्मीद लगाए रहते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में मतदान अधिक होता है। जबकि, शहरी क्षेत्र के लोग नेताओं से कोई विशेष अपेक्षा नहीं रखते। यही वजह है कि उनका मतदान को लेकर रुख उदासीन रहता है।
- डॉ. आरबी मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान- बीकेडी कालेज
राजनैतिक दलों ने तोड़ा भरोसा
सभी राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र में कमोबेश एक समान ही वादे होते हैं। चुनाव के बाद क्रियान्वयन की स्थिति अलग होती है। यही वजह है कि लोगों का भरोसा राजनैतिक दलों और उनके नुमाइंदों के प्रति कम हुआ है। सामान्य सी धारणा बन गई है कि मंच पर कही जाने वाली बातों में सच्चाई कम होती है। जबकि, ग्रामीण इन बातों को गंभीरता से लेते हैं। इसी वजह से शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान की स्थिति बेहतर रहती है।
- डॉ. जितेंद्र तिवारी, एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र- बीकेडी कालेज