इस बार विधानसभा चुनाव में विकास कार्य बड़ा मुद्दा बन सकते हैं। खासतौर पर वे काम जो शुरू तो हुए, लेकिन तय समय पर पूरे नहीं हो सके। कभी बजट कमी तो कभी सिस्टम की सुस्ती विकास कार्यों पर भारी पड़ी और इसका लाभ जिले को नहीं मिल सका। अब गेंद पब्लिक के पाले में है। विधानसभा चुनाव नतीजों पर इसका असर पड़ सकता है।
2012 में प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिले के विकास की कई घोषणाएं की थीं, लेकिन इनमें से कुछ ही धरातल पर मूर्त रूप ले पाई हैं। काम की तय अवधि पूरी होने के बाद भी विकास की कई परियोजनाएं अब भी अधूरी ही हैं। इसके अलावा 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने पर लोगों को जिले के तेजी से विकास की उम्मीद जगी थी, लेकिन झांसी और आसपास जिलों को इसका लाभ अभी तक नहीं मिल सका। केंद्र सरकार ने पर्यटन विकास का खाका खींचा था। कुछ काम शुरू भी हुआ लेकिन बीच में ही ठप हो गया।
अब विधानसभा चुनाव में एक बार फिर राजनैतिक दल विकास के दावे और वादों के साथ जनता के बीच जाएंगे। उन्हें जनता को अब तक विकास की रिपोर्ट भी देनी होगी। ऐसे में अधूरे विकास पर सफाई देना नेताओं के लिए आसान नहीं होगा। सवाल तो खड़े होंगे और इसका जवाब उम्मीदवारों के साथ राजनीतिक दलों को भी देना होगा।
ये काम अधूरे
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- सीपरी बाजार व मऊरानीपुर में रेलवे ओवरब्रिज
- मेडिकल कालेज में 500 बेड का अस्पताल
- राजकीय इंटर कालेज का हेरीटेज लुक
- अरबन हाट का निर्माण
- जेडीए में शामिल 63 गांवों का शहरी विकास
- दिगारा में सैनिक स्कूल का निर्माण
- एरच बहुउद्देश्यीय बांध परियोजना
- महानगर की पेयजल महायोजना
ये काम तो भूल ही गए
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- ग्वालियर रोड रेलवे क्रासिंग पर ओवरब्रिज की फाइल शासन के पास, लेकिन नहीं लिया गया फैसला।
- ग्वालियर रोड पर पाल कालोनी के पास 10 साल से ओवरब्रिज का निर्माण अधूरा पड़ा है। सेना की आपत्ति के चलते निर्माण रुका है, लेकिन इस आपत्ति को दूर कराने की नहीं हुई पहल।
पर्यटन विकास को लगा पलीता
क्षेत्र के पर्यटन विकास के लिए कई योजनाएं बनाई गईं। केंद्र सरकार ने रानी की गौरव गाथा पर आधारित टूरिस्ट सर्किट का खाका तैयार किया था, लेकिन यह योजना दो साल बाद भी फाइलों से बाहर नहीं आ पाई। जबकि, गढ़मऊ झील व लक्ष्मीताल के पर्यटन विकास का काम बजट की कमी से अधूरे में ही बंद हो गया।
रोजगार की दिशा में नहीं हुआ काम
क्षेत्र की बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए यहां नेशनल मैन्युफैक्चरिंग जोन की स्थापना की केंद्र सरकार ने चार साल पहले योजना बनाई थी। इसके तहत उद्योगों की स्थापना के लिए टहरौली व गरौठा तहसील में पांच हजार हेक्टेअर जमीन भी चिह्नित कर ली गई थी, लेकिन यह भी अब तक फाइलों में ही है।