- ओलंपिक में खेलने का सपना पूरा करने के लिए बॉक्सिंग रिंग कर रहे कड़ी मेहनत
संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। हमारे मुक्कों और इरादों में इतना दम है कि हर मुश्किल बाजी को जीत सकते हैं। जिंदगी की हर मुश्किल को हम अपने हुनर के दम पर मात देना चाहते हैं। मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में चल रहे केंद्रीय प्रशिक्षण शिविर में प्रदेशभर से आए मुक्केबाज कुछ इसी जोश के साथ बॉक्सिंग रिंग में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। बॉक्सिंग जैसे खेल में महारत हासिल करने की चाह रखने वाले ये मुक्केबाज अपने परिजनों के सपनों को पूरा करना चाहते हैं। इनमें कई मुक्केबाज ऐसे हैं जिनकी पारिवारिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसी के पिता ऑटो चलाते हैं तो कोई मजदूरी करके ओलंपिक तक का सफर करना चाहता है। उन्हें विश्वास है कि एक दिन वो भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए ओलंपिक में मेडल जीतेंगे और देश का नाम रोशन करेंगे।
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मम्मी-पापा का सपना पूरा करना चाहते हैं किशन
बहराइच के रहने वाले बॉक्सिंग खिलाड़ी किशन वर्मा ने बताया कि उनके पिता ऑटो चलाते हैं और मां घरों में खाना बनाती हैं। घर में आर्थिक तंगी रहती है। माता-पिता का सपना मुझे ओलंपिक में प्रतिभाग करते देखना है, इसलिए मैं पूरी मेहनत से जुटा हूं। छात्रावास में प्रवेश लेकर बॉक्सिंग के गुर सीखूंगा और एक दिन अच्छा मुक्केबाज बनूंगा।
ओलंपिक तक का सफर तय करना चाहते हैं हिमांशु
बनारस के हिमांशु यादव ओलंपिक तक का सफर तय करना चाहते हैं। हिमांशु बताते हैं कि मेरे पिता ग्रामीणों से दूध की खरीद करते हैं और फिर उसे शहर में जाकर बेचते हैं। पिता चाहते हैं कि मैं अच्छा मुक्केबाज बन सकूं। कई बार किट खरीदने के लिए पैसे नहीं होते हैं। स्कूल के शिक्षक मदद करते हैं। चाहता हूं कि छात्रावास में प्रवेश लेकर पिता के सपने को पूरा कर सकूं।
बॉक्सर बहनों के नक्शे कदम पर चल रहे आयुष
मेरठ के रहने वाले आयुष सोनकर अपनी बॉक्सर बहनों के नक्शे कदम पर चल रहे हैं। घर में आर्थिक तंगी की वजह से बहनें तो राज्य स्तर से आगे का सफर तय नहीं कर सकीं, लेकिन आयुष अपनी बहनों का अधूरा सपना पूरा करना चाहते हैं। आयुष बताते हैं कि पिता ऑटो चलाते हैं तो ज्यादा पारिवारिक आय नहीं हो पाती। लेकिन पापा मुझे प्रोत्साहित करते हैं। मैं देश के लिए खेलना चाहता हूं।
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दिन में मजदूरी, शाम को करता हूं अभ्यास
प्रयागराज के दीपक कुमार यादव के पिता की दो साल पहले मौत हाे चुकी है। दीपक बॉक्सर बनना चाहते हैं, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी भी है। इसलिए वे सुबह टाइल्स की दुकान पर मजदूरी करते हैं और शाम को बॉक्सिंग का अभ्यास करते हैं। दीपक बताते हैं कि राज्य स्तरीय बॉक्सिंग प्रतियोगिता में खेल चुका हूं। शिविर में आने से दो दिन पहले बड़ी बहन की मौत हो गई। मैं कैंप में नहीं शामिल हो रहा था, लेकिन बड़े भाई के कहने पर शिविर में आया हूं। यहां प्रतिभा दिखा रहा हूं।