झांसी। जिन सस्ती और कारगर जेनरिक दवाओं को संजीवनी की भूमिका अदा करनी थी वे बुंदेलखंड के जन औषधि केंद्रों में पड़े-पड़े एक्सपायर हो गईं। दवा कारोबारियों के अनुसार कोरोना काल में अस्पतालों के ओपीडी बंद होने के कारण बुंदेलखंड क्षेत्र में कम से कम दो करोड़ रुपये से अधिक कीमत की जेनरिक दवाएं ‘कूड़ा’ बन गईं। अभी भी बिक्री ने रफ्तार नहीं पकड़ी है। इससे इस कारोबार की कमर टूट रही है।
लोगों को रियायती दामों पर दवाइयां मुहैया कराने के लिए सरकार द्वारा जन औषधि केंद्र खोले गए हैं। जिले भर में 15 व बुंदेलखंड क्षेत्र में लगभग सौ से अधिक केंद्रों का शुभारंभ किया गया था। इन केंद्रों पर मिलने वाली दवाएं बाजार से मिलने वाली दवाओं से पचास से नब्बे फीसदी तक सस्ती होती हैं। लेकिन कोरोना काल के दौरान अस्पतालों की ओपीडी को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। जिसके चलते मरीजों की कमी हो गई थी। वहीं, अस्पतालों के ओपीडी शुरू होते ही मरीजों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो सका। जिसका खमियाजा बुंदेलखंड के जन औषधि केंद्र संचालकों को भुगतना पड़ रहा है।
बुंदेलखंड क्षेत्र के जन औषधि केंद्र संचालकों की लगभग दो करोड़ से अधिक की दवाइयां एक्सपायर हो कर बेकार हो गई हैं। जिनको संचालकों द्वारा ही नष्ट किया गया है। जिला अस्पताल के औषधि केंद्र संचालक फार्मासिस्ट शशांक ने बताया कि कोराना महामारी शुरू होने से लेकर अब तक एंटीबायोटिक टेबलेट व इंजेक्शन, बच्चों के सिरप, बुखार, गैस, बीपी, शुगर, पेट दर्द, आई ड्राप व कोलेस्ट्रोल की दवाओं सहित सौ से अधिक दवाएं एक्सपायर हो गई हैं। जिसके चलते चालीस से पचास हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
मेडिकल के सामने स्थित जन औषधि केंद्र के संचालक केतन जैन के अनुसार कोरोना काल में ही तीस से पैंतीस हजार रुपये की दवाइयां बेकार हो गई हैं। उनके अनुसार अधिक सटॉक वाले दुकानदारों को दो से पांच लाख तक का नुकसान हुआ है। डॉक्टरों द्वारा भी किसी भी तरह का सहयोग नहीं किया जा रहा है। चिकित्सक भी जन औषधि केंद्र की दवाएं लिखने से परहेज कर रहे हैं। वहीं बड़ागांव गेट बाहर जन औषधि केंद्र संचालक राजेंद्र धमेले के अनुसार महामारी के दौरान ही पचास हजार से अधिक की दवाओं को नष्ट करना पड़ा है।