झांसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. उमेश पंकज व डॉ. अर्जुन लाल ओला ने सब्जियों में ट्राइकोडर्मा (दवा) से बीज उपचार की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि यदि पौधशाला लगाने से पहले ही बीज उपचार किया जाए तो बाद में होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है और आर्थिक नुकसान कम किया जा सकता है।
बुआई के बाद कई प्रकार के जीवाणु एवं कवक जनित रोगों का प्रकोप होता है। जीवाणु एवं कवक जनित रोगों के कारण या तो बीज अंकुरित नहीं हो पाते है। यदि अंकुरित हो गए तो पौध की अच्छी वृद्धि नहीं हो पाती है और पौध मर जाती है। इसके कारण उत्पादन एवं उत्पादकता पर भी प्रभाव पड़ता है। इन रोग के प्रकोप से बचने के लिए सब्जियों के बीज के ट्राइकोडर्मा नामक जैविक रोग नाशक से उपचारित करने से इन रोग से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। ट्राइकोडर्मा का पैकेट सभी सरकारी व निजी बीज भंडार की दुकानों पर भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है। बीजों के उपचारण के लिए चार ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति ट्राइकोडर्मा बीज की दर से उपयोग करते हैं। सर्वप्रथम 10 प्रतिशत (एक लीटर पानी में 100 ग्राम) गुड़ का घोल बनाकर बनाकर उसमें ट्राइकोडर्मा मिला देते हैं। उसके बाद ट्राइकोडर्मा घोल को बीजो के ऊपर फैलाकर अच्छे से मिला देते हैं, जिससे ट्राइकोडर्मा घोल बीजों की सतह पर चिपक जाए। 30-60 मिनट तक बीजों को छाव में सुखा दें। अब बीज बुआई के लिए तैयार हैं। ट्राइकोडर्मा का उपयोग पर्यावरण की दृष्टि से भी फायदेमंद तथा जैविक खेती को बढ़ावा देता है। यह फसल उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक है। इससे खेती में कुल रासायनिक दवाओं के खर्चे को भी काम किया जा सकता है, जिससे फसल लागत घट जाती है।