संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। कंकड़ पत्थर और घास में खेलकर दद्दा मेजर ध्यानचंद ने हॉकी के जादूगर का खिताब पाया। उनके पुत्र अर्जुन अवार्डी अशोक ध्यानचंद ने 1975 में विजयी गोल दागकर भारत को विश्व कप हॉकी का विजेता बनाया।
इस जीत के 50 वर्ष पूर्ण होने पर दिल्ली में आयोजित समारोह में अशोक ध्यानचंद को सम्मानित किया गया। इससे हाॅकी खिलाड़ी और खेल प्रेमियों में खुशी की लहर है। उनका कहना है कि पहले कम संसाधनों और सुविधाओं के बाद भी भारत विश्व कप हॉकी विजेता बना लेकिन अब तमाम सुविधाओं के बाद भी खिलाड़ी विश्व कप से दूर हैं।
- ये बोले खेल प्रेमी
- अशोक ध्यानचंद को सम्मान मिलने से हॉकी खिलाड़ी काफी उत्साहित हैं। इससे खिलाड़ी प्रेरित होंगे और खेल का अच्छा प्रदर्शन करने के लिए और मेहनत करेंगे। अगर हॉकी में खिलाड़ियों चयन ठीक ढंग से किया जाए तो अच्छे खिलाड़ी निकल सकते हैं। - सुरेश भागौरिया, हॉकी कोच
- दद्दा मेजर ध्यानचंद के पद चिह्नों पर चलकर कई खिलाड़ी हॉकी खेल को आगे बढ़ा रहे हैं। सुविधाओं के कारण विदेशों में हॉकी काफी तेजी से बढ़ी और भारत में हॉकी का स्तर गिरता गया। अब सुविधाएं मिलने से नए खिलाड़ी उभर कर आ रहे हैं। - मुन्नालाल कुशवाहा, हॉकी कोच
- पहले घास में हॉकी खेलते थे और अब टर्फ पर खेला जा रहा है। खेलों में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव हुआ है। हॉकी की तकनीकी में भी बदलाव हो गया है पहले हिट मार कर गोल किया जाता था, अब शूट आउट से निर्णय होता है। - सतीश चंद्र लाला, हॉकी कोच
- हॉकी में अब स्किल के साथ दमखम की ज्यादा जरुरत है। हॉकी को बढ़ावा देने के लिए ज्यादा से ज्यादा टर्फ लगें, स्कूलों और स्थानीय स्तर पर भी खिलाड़ियों को सुविधा प्राप्त हों, क्लबों का भी गठन किया जाए। तभी अच्छे खिलाड़ी निकल सकते हैंं। - राजेश सोनकर, उपक्रीड़ा अधिकारी एवं हॉकी कोच