बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र में युवा कलाकार मुखौटा बनाते हुए।
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मुखौटे के बिना रंगमंच व लोकनृत्य अधूरा
झांसी। भारत सहित सभी देशों में मुखौटों के बिना रंगमंच और लोकनृत्य अधूरे हैं। बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र में युवाओं को मुखौटा बनाने की कला सिखाई जा रही है। यह कार्यशाला सात दिनों तक चलेगी। प्रशिक्षकों का कहना है कि ग्रीक और भारतीय उपमहाद्वीप में रंगमंच और लोक नाट्य कला का अहम स्थान रहा है। रंगमंच के कलाकार मुखौटे लगाकर अपने भावों को दर्शकों तक पहुंचा देते हैं।
सिद्धेश्वर नगर स्थित केंद्र में राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. हिमांशु द्विवेदी ने बताया कि मुखौटा निर्माण की कला लगभग ढाई हजार वर्ष पुरानी है। इसकी शुरुआत ग्रीक से हुई थी। ग्रीक के रंग मंडप में लगभग 25 हजार दर्शक एक साथ नाटक देखते थे। जनसमूह रंगमंच के चरित्रों को सरलता से पहचान ले। ऐसे में मुखौटे बनाए गए, जिन्हें किसी विशेष भाव को प्रदर्शित करने के लिए प्रयोग में लाए जाते थे। वर्तमान में व्यंग्य के भाव वाले मुखौटे, सामाजिक भाव के मुखौटे के अलावा अन्य हाव भाव को दर्शाने वाले मुखौटों का उपयोग होता है। इसके अलावा भारत में भी नाटक एवं रामलीला मंचन में मुखौटा लगाने की परंपरा रही है। आम दर्शक इन मुखौटों के जरिये ही तुरंत चरित्र को पहचान लेता है। बंगाल सहित कई राज्यों के लोकनृत्य में ईश्वरीय प्रतीकों एवं बुराइयों को दर्शाने वाले मुखौटों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। कार्यशाला में प्रशिक्षक डा. हिमांशु द्विवेदी ने मुखौटे कैसे बनाए जाए पर बताया कि इसे बनाने की क ई विधियां है। वर्तमान में इसे लकड़ी, रबड़, प्लास्टिक, मिट्टी, अखबार के कागज, पीओपी आदि से तैयार किया जाता है। सह प्रशिक्षक महेंद्र वर्मा के अनुसार मुखौटा तैयार करने में सबसे पहले अखबार के कागज के कई छोटे-छोटे टुकडे़ कर उसे पानी में भिगोते हैं। चेहरे पर उसके तीन लेयर बनाते हैं। इसके बाद पानी में भिगोकर कागज के टुकड़ों पर गम लगाकर पांच लेयर बनाते हैं, जो चेहरे पर लगाए जाते हैं। एक दिन सूखने के बाद कटिंग पर उसे फिनिशिंग देने के लिए प्लास्टिक ऑफ पेरिस का उपयोग किया जाता है। इस पर मुखौटा तैयार हो जाता है।