फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Jhansi News: खुद को साबित करने का जोश... उठा रहीं जिम्मेदारियों का ''''''''बोझ''''''''

विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन

झांसी। अगर मन में खुद को साबित करने का जोश है तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। वे अपने जुनून और जज्बे के साथ जिम्मेदारियों का बोझ उठा रही हैं। उनका यही जोश मिसाल है उन महिलाओं के लिए जो मुश्किलों से हारकर पीछे हट जाती हैं। उनकी कहानी ऐसी महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो समाज की नकारात्मक बातों में आकर खुद को कमजोर मान लेती हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शृंखला में ऐसी महिलाओं के बारे में आपको बता रहे हैं जिनके जीवन में एक वक्त में सब कुछ खत्म सा हो गया था। लेकिन उन्होंने अपने जोश और जुनून के बल पर खुद को खड़ा किया और अपनी अलग पहचान कायम की। आधुनिक दौर में महिला सशक्तीकरण का संदेश दिया।

पति के मौत के बाद बन गईं कुली
झांसी रेलवे स्टेशन पर कुली 46 साल की शमीम बानो ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कुली का काम करेंगी। चौका-चूल्हे में जिंदगी बिता रहीं शमीम बानो पर 2018 में ऐसा पहाड़ टूटा कि उनकी दुनिया उजड़ गई। इस साल झांसी स्टेशन पर कुली का काम करने वाले उनके पति मुन्ना की मौत हो गई। शमीम बानो पर बेटी-बेटे की परवरिश और घर को चलाने की जिम्मेदारी आ गई। कई दिनों तक सोचती रहीं कि क्या किया जाए कि घर चल सके? घर में हालात बिगड़ते देखे तो एक दिन पति का बिल्ला उठाया और हाथ पर बांधकर स्टेशन पहुंच गईं। यहां उन्होंने लाल वर्दी में यात्रियों का सामान उठाना शुरू कर दिया। शमीम बानो बताती हैं कि शुरुआत में तो लोगों ने कुली का काम करने को लेकर खूब ताने मारे। दूसरे काम करने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे बताती हैं कि यात्रियों के सामान का बोझ उठाना शुरू में तो आसान नहीं था, लेकिन जिम्मेदारी के बोझ के सामने यह बोझ अब हल्का लगने लगा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

-
पार्सल की लोडिंग-अनलोडिंग कराती थीं सुनीता
रेलवे के वाणिज्य विभाग में चीफ सुपरवाइजर सुनीता झा ने भी खुद को साबित करने के लिए कड़ा संघर्ष किया। उन्हाेंने अपने परिवार और मां-बाप की सेवा की खातिर शादी नहीं की। सुनीता बताती हैं कि 1995 में बीएड करने के बाद उनका चयन रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में पार्सल पोटर के पद पर हुआ। वह बताती हैं कि पार्सल पोर्टर का काम मालगाड़ियों से आने वाले पार्सल की लोडिंग अनलोडिंग करना होता है। शुरुआत में काफी दिक्कत हुई। लोग यह कहकर मनोबल गिराते थे कि बीएड करने के बाद चतुर्थ श्रेणी के पद पर काम करती हो। मालगाड़ियों से पार्सल उतारकर ऑफिस तक पहुंचाना होता था। कई बार कहा गया कि ये पार्सल का काम मत करो, लेकिन परिवार को संभालने और समाज को सकारात्मक संदेश देने के लिए उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। पार्सल पोर्टर सुनीता आज चीफ सुपरवाइजर हैं। वह रेलवे में दीदी के नाम से मशहूर हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें