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Jhansi News: देश के बंटवारे के दंश ने बना दिया था शरणार्थी

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विश्व शरणार्थी दिवस पर विशेष
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। घर था, खेत थे और मान सम्मान भी बहुत था, लेकिन देश के बंटवारे के दंश ने एक झटके में शरणार्थी बना दिया था। जो दूसरों को नौकरी पर रखे हुए थे, वह यहां काम की तलाश में भटकने को मजबूर हो गए थे। यहां बात हो रही है बंटवारे के बाद पाकिस्तान से परिवार के साथ आए वधायाराम की, जिन्होंने यहां आकर नए सिरे से जीवन की शुरुआत की थी।
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देश की आजादी की सुगबुगाहट के साथ अंग्रेजों ने भारत के बंटवारे का भी ताना-बाना बुन दिया था। बंटवारे के दौरान भड़की हिंसा में लाखों लोगों को पाकिस्तान से भागकर यहां आना पड़ा था। उस दौर में पाकिस्तान से आए 70 परिवार भी झांसी पहुंचे थे। उन्हें यहां नई पहचान शरणार्थी दी गई थी। इनमें वधायाराम भी थे, जिनका परिवार प्रेमनगर में रहता है। वधायाराम के पोते तरुण अरोड़ा ने बताया कि उनके दादा पाकिस्तान के गुजरात से यहां आए थे। वहां वह खेती करते थे। घर में गाय-भैंस पली हुई थी और नौकर-चाकर भी थे। बंटवारे के दौरान उन्हें अपना सब कुछ पाकिस्तान में छोड़कर आना पड़ा था। पहले वह इंदौर के पास रहे और बाद में झांसी प्रेमनगर में आकर बस गए थे। तब परिस्थितियों में एकदम से बदलाव हुआ था। जमीन-जायजाद, पैसा सब पाकिस्तान में छूट गया था। यहां आकर जीवन की नई शुरुआत की थी। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने पर सालों लग गए थे। पाकिस्तान से भारत आए सभी शरणार्थियों की कमोबेश यही स्थिति रही थी। दादा के मुंह से बंटवारे की दुश्वारियों को सुनकर रूह कांप जाती थी।
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