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दिन बहुर सकते हैं बीस साल से बंद सूती मिल के

Mon, 10 Apr 2017 01:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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cotton mill - फोटो : demo
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प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने बंद पड़ीं राज्य वस्त्र निगम की कताई मिलों को फिर से शुरू करने की संभावना तलाश करने के निर्देश दिए हैं। इससे 20 साल बंद झांसी की सूती मिल फिर खुलने की उम्मीद जगी है। 
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उत्तर प्रदेश राज्य वस्त्र निगम ने 1977 में झांसी में ग्वालियर रोड पर सूती मिल की स्थापना की थी। 77 एकड़ के विस्तृत क्षेत्रफल में फैली इस मिल में आधुनिक मशीनों के माध्यम से सूती धागे का निर्माण किया जाता था। यहां बने धागे की पूरे देश में मांग होती थी। मिल तीन शिफ्टों में चलती थी लेकिन, लगातार घाटे के चलते नवंबर 1997 में मिल बंद हो गई। मिल चालू करने के लिए लंबे समय तक आंदोलन चलाए गए, परंतु नतीजा सिफर ही रहा। 

साढ़े तीन हजार मजदूर थे 
सूती मिल में वैसे तो साढ़े चार हजार से अधिक मजदूर और कर्मचारी थे। लेकिन, बंदी की सुगबुगाहट के साथ ही कई कर्मचारी पहले ही काम छोड़कर चले गए थे। मिल बंदी के दौरान साढ़े तीन हजार मजदूर थे, जो सड़क पर आ गए थे।
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ठेके पर फायदा 
लगातार घाटा होने की वजह से मिल को सरकार ने तीन साल के लिए ठेके पर भी दिया था। इसके सुखद परिणाम सामने आए थे। मिल मुनाफे में पहुंच गई थी। मिल के कर्मचारी श्रीपाल ने बताया कि मिल को फायदा होने की वजह से ठेके पर लेने वाली कंपनी ने सभी कर्मचारियों को नकद पुरस्कार भी बांटे थे। लेकिन, दुबारा सरकारी हाथ में पहुंचने के बाद मिले घाटे में चली गई। 

बाजार में बिकती थी मिल की रूई
अपनी गुणवत्ता की वजह से सूती मिल की रूई की केवल शहर के बाजारों में ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी बढ़ी मांग थी। चोरी से इसे मिल से निकाला जाता था, जिसकी बिक्री खुले बाजारों में धड़ल्ले से की जाती थी। मिल के घाटे में जाने की एक बढ़ी वजह यह भी रही। 

कालोनी निर्माण की थी योजना 
पिछली सरकार में आवास विकास परिषद ने बंद पड़ी सूती मिल में कालोनी निर्माण की योजना बनाई थी। आवास विकास परिषद यहां विभिन्न साइजों के प्लाट /मकान व डुप्लेक्स बनाकर बेचने की तैयारी थी। इसके लिए कागजी कार्यवाही भी शुरू कर दी गई थी। लेकिन, प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई थी। 

मिल हो गई कबाड़
बीस साल से बंद मिल अब कबाड़ हो गई है। हां, कुछ मशीनों की मरम्मत कर उन्हें इस्तेमाल के योग्य बनाया जा सकता है। अब यहां आधुनिक मशीनें लगानी होंगी और नए सिरे कुछ मजदूरों और प्रबंधकों की नियुक्ति कर इसमें जान फूंकनी होगी। इसे निजी क्षेत्र से सहयोग से भी चलाया जा सकता है।

कोई सब्जी बेच रहा तो कोई चाय
मिल बंद होने के बाद कोई अपने गांव को लौट गया, कोई ठेला चलाने लगा, कोई चाय बेचने लगा, कोई ईंट-गारा करने लगा, किसी ने निजी कारखानों, दुकानों में नौकरी कर ली तो कोई मुफलिसी के चलते बीमार पड़ गया। न जाने कितने मजदूर कर्ज में डूब गए तो कई सूदखोरों के चंगुल में फंस गए। मिल बंद हुई तो कई मजदूरों को उनके बकाए का भुगतान भी नहीं हुआ। किसी का फंड नहीं मिला तो किसी को वीआरएस में ही संतोष करना पड़ा। अमर उजाला ने कुछ मजदूरों से बात की तो उनका दर्द छलक पड़ा और अब उन्हें योगी सरकार से उम्मीद है कि वे उन्हें उनके अच्छे दिन लौटा सकते हैं। 

बकाया भुगतान मिलने की है आस 
प्रतापगढ़ के शिव देव की 1980 में सूती मिल में मशीन ऑपरेटर बने। अचानक मिल बंद हो जाने से उनके जीवन में भूचाल आ गया। उन्होंने ग्वालियर रोड पर पालीटेक्निक के पास एक लकड़ी के खोखे में हेयर कटिंग का काम शुरू कर दिया। किसी तरह जीवन - यापन कर रहे हैं। शिव देव ने बताया कि मिल शुरू होने से उनका बकाया भुगतान मिलने की भी संभावनाएं बन जाएंगी, जो उनकी वृद्धावस्था के काम आएगा। 

पाई-पाई को मोहताज 
सूती मिल फिटर रहे श्रीपाल सिंह चौहान ने नौकरी करते प्लाट खरीदा था जो मिल बंद होने के बाद बेचना पड़ा। न रहने को छत और न हाथ को रोजगार। सालों कभी ठेला चलाकर पेट पाला, तो कभी मजदूरी करके। थक हारकर उन्नाव बालाजी रोड के किनारे चाय की दुकान खोल ली। श्रीपाल का कहना है कि अब उनकी तो नौकरी की उम्र निकल गई है, लेकिन मिल चालू होने से युवाओं को जरूरी रोजगार मिलेगा। 
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