झांसी। सीपरी की जिन झुग्गी-झोपड़ियों में बच्चों को पैदा होने के बाद से ही पेट भरने के लिए विभिन्न काम सिखाए जाते थे, उनमें ध्यानचंद कालोनी के ‘लाल’ राजकुमार दुबे ने बिना किसी सरकारी सहायता के ज्ञान का ऐसा दीप जलाया कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी साक्षर हो गए और बेटे-बेटियों के लिए उच्च शिक्षा की राह खुल गई।
सीपरी में खालसा स्कूल के पास स्थित झुग्गी-झोपड़ी राजकुमार दुबे ने 26 जून 2000 को बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को पढ़ाने की शुरुआत की थी। पहले उन्होंने खुले मैदान में छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। दो साल बाद उन्होंने यहां टीन शेड में एकलव्य विद्यालय की शुरुआत की। वह यहां सुबह व शाम को समय देते थे, क्योंकि बाकी समय उन्हें एक विद्यालय में बतौर शिक्षक कार्य करना पड़ता था, लेकिन 2005 में पत्नी की बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षिका के पद पर तैनाती के बाद उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और वह पूरी तरह से इन झुग्गी-झोपड़ियों में ज्ञान का दीप जलाने के लिए समर्पित हो गए।
बच्चों के साथ-साथ यहां उन्होंने युवाओं व बूढ़ों को भी पढ़ाना शुरू कर दिया। शुरुआत में बस्ती के लोगों ने ज्यादा रुचि नहीं दिखाई, लेकिन, निरंतर प्रयास के बाद उनके विद्यालय में सभी आयु वर्ग के लोग जमा होने लगे। डेढ़ दशक बाद स्थिति यह है कि अब बस्ती में ज्यादातर लोग पढ़ना-लिखना सीख गए हैं। कई लड़कियां कॉलेजों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। हालांकि, अभी भी लड़कों को होश संभालते ही पेट की आग बुझाने के लिए काम पर निकलना होता है। इसलिए अधिकांश साक्षर होने तक सीमित हैँ।
राजकुमार दुबे द्वारा बस्ती में खोले गए सरस्वती संस्कार केंद्र में लड़कियां कंप्यूटर चलाना सीख रही हैं, तो महिलाएं सिलाई-कटाई की ट्रेनिंग ले रही हैं। यह सभी काम नि:शुल्क जारी हैं। इसके लिए किसी तरह की फीस नहीं ली जाती है।
मदद को भी बढ़े हाथ
झांसी। राजकुमार दुबे का तमाम लोग सहयोग कर रहे हैं। कोई उनके केंद्र को कंप्यूटर दान देता है, तो कोई सिलाई मशीन। यहां के बच्चों को उच्च शिक्षा हासिल करने में भी लोगों की आर्थिक मदद मिल जाती है। इसके अलावा लोगों के सहयोग से लड़कियों की शादी भी धूमधाम से होती है।
पढ़ रही और दूसरों को भी पढ़ा रही रेखा
झांसी। झुग्गी बस्ती में रहने वाली रेखा के परिवार के किसी भी सदस्य का पढ़ाई से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रहा। उनके परिवार में फेरी लगाकर बर्तन के बदले पुराने कपड़े लेने का काम होता है, लेकिन रेखा बीए फाइनल ईयर में है । वह केंद्र में कंप्यूटर सिखाती हैं। रेखा नौकरी करना चाहती हैं। वह इसकी तैयारी में जुटी हुई हैं।
10 भाई-बहनों को पढ़ा रही हैं जुगनी
झांसी। बस्ती की अन्य लड़कियों की तरह जुगनी की भी कम उम्र में शादी हो गई थी। अभी उनकी उम्र 22 साल है और छह साल पहले उनका तलाक हो चुका है। इसके बाद जुगनी ने पढ़ाई शुरू की। वह पढ़ने-लिखने लगी हैं और अब अपने 10 भाई-बहनों को भी पढ़ा रही हैं। जुगनी कहती हैं कि जो उन्होंने परेशानी उठाई है, अपने भाई-बहनों को नहीं उठाने देगी। इसके लिए सभी का पढ़ना जरूरी है।