फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

साधारण सिरदर्द समझकर खाते रहे दवाएं, जांच में निकली ब्रेन टीबी

विज्ञापन
विज्ञापन
झांसी। कोरोना काल में लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने, फेफड़ों को नुकसान पहुंचने से टीबी रोगियों की संख्या बढ़ी है। साथ ही ब्रेन टीबी के मरीजों में भी 25 प्रतिशत का इजाफा हो गया है। डॉक्टरों का कहना है कि शुरूआत में मरीज इस बीमारी को सिरदर्द समझकर दवाएं खाते रहते हैं। बाद में जब इसका पता चलता है तब तक हालत बिगड़ चुकी होती है।
विज्ञापन

टीबी के कीटाणु सांस के जरिए फेफड़े में पहुंचते हैं। इसके बाद खून के जरिए टीबी शरीर के विभिन्न अंगों जैसे रीढ़ की हड्डी, दिमाग आदि में फैल सकती है। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अरविंद कनकने ने बताया कि कोरोना की चपेट में आ चुके कई रोगियों को टीबी की बीमारी हो गई है। इस कारण ब्रेन टीबी के मरीज भी 25 फीसदी तक बढ़ गए हैं। अब हर महीने ओपीडी में 25-30 मरीज ब्रेन टीबी से ग्रसित पाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ब्रेन टीबी खतरनाक बीमारी है। ये हमारे दिमाग को प्रभावित करती है। धीरे-धीरे टीबी के जीवाणु दिमाग में प्रवेश कर गांठ बना लेते हैं। ये गांठ बाद में टीबी का रूप ले लेती है। इससे दिमाग की झिल्लियों में सूजन हो जाती है। इस बीमारी के मरीज कोमा में भी जा सकते हैं।
10 से 12 फीसदी मरीजों को होती ये बीमारी
डॉ. अरविंद कनकने ने बताया कि क्षय रोग के 75 फीसदी मरीजों को फेफड़े की टीबी होती है। इसके बाद 10 से 12 प्रतिशत रोगियों को ब्रेन टीबी होती है। बाकी बचे हुए रोगियों को पेट, हड्डी, किडनी आदि में टीबी होती है।
विज्ञापन

नौ माह से डेढ़ साल में हो जाती ठीक
मेडिकल कॉलेज के चेस्ट रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री ने बताया कि जिला अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी, मेडिकल कॉलेज में डॉट्स केंद्रों पर हर प्रकार की टीबी के इलाज के लिए नि:शुल्क दवाएं दी जाती हैं। उन्होंने बताया कि ब्रेन टीबी नौ महीने से डेढ़ साल में ठीक हो जाती है।
ये हैं लक्षण
- बेहोशी, थकान
- चक्कर आना
- सिरदर्द रहना
- मिर्गी के दौरान
- कम तीव्रता का बुखार
- उल्टी, चिड़चिड़ापन
ऐसे चलता है पता
ब्रेन टीबी के लक्षण दिखाई देने के बाद रोगी को डॉक्टर से चिकित्सीय परीक्षण करवाना चाहिए। ब्रेन टीबी के इलाज में लापरवाही बरतना घातक साबित हो सकता है। एमआरआई, सीटी स्कैन और सीएसएफ (रीढ़ के हड्डी का पानी) जांच से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें