मेडिकल कॉलेज में दवाओं का टोटा, मरीज परेशान
झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में दवाओं का टोटा हो गया है। तीन महीने पहले तक मेडिकल कॉलेज में पांच सौ प्रकार की दवाएं उपलब्ध थीं, जो कि अब घटकर 260 प्रकार की रह गई हैं। इस वजह से ओपीडी में मरीजों को पांच में से दो ही दवाएं मिल पा रही हैं। घंटों धूप में लाइन में लगने के बाद सीमित दवाएं मिलने पर मरीज व उनके परिजन भी आपा खो देते हैं। दवा काउंटर पर हर समय विवाद की स्थिति बनी रहती है।
मेडिकल कॉलेज में झांसी व आसपास के जनपदों के मरीज भी इलाज कराने के लिए आते हैं। पिछले कुछ सालों से प्रदेश सरकार द्वारा भरपूर बजट उपलब्ध कराने से अधिकतर दवाएं मरीजों को मिलनी शुरू हो गईं थी। मेडिकल कॉलेज में तीन महीने पहले तक पांच सौ प्रकार की दवाएं उपलब्ध थीं, लेकिन अब 260 प्रकार की ही हैं। इस वजह से मेडिकल कॉलेज प्रशासन का ज्यादा जोर वार्ड और इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को उपलब्ध दवाओं में अधिकतर देने पर है। ऐसे में ओपीडी में दवाओं का जबरदस्त टोटा हो गया है। ओपीडी में मरीजों को पांच में से दो ही दवाएं मिल पा रही हैं। इस वजह से मरीजों को काफी परेशानी हो रही है। उन्हें बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
ये है स्थिति
मेडिकल कॉलेज में कुछ समय पहले तक 25 तरह की एंटीबायोटिक दवाएं अथवा इंजेक्शन उपलब्ध थे। अब 12 प्रकार के ही बचे हैं। उच्च किस्म के एंटीबायोटिक नहीं हैं। सामान्य दवा ही मरीजों को मिल पा रही हैं। दर्द, सूजन कम करने की छह-सात प्रकार की दवाओं में दो प्रकार की ही मिल पा रही हैं। एसिडिटी के लिए चार तरह की दवाओं में अब सिर्फ एक ही प्रकार की उपलब्ध है। ह्रदय रोगों से संबंधित आठ प्रकार की दवाएं पहले मिलती थीं, अब तीन ही किस्में हैं। अन्य रोगों की भी यही स्थिति है।
चिकित्सक भी कम नहीं
शासन का स्पष्ट आदेश है कि मरीजों को जेनरिक फॉर्मूले पर ही दवाएं लिखी जाएं। ब्रांड का नाम कतई नहीं लिखा जाए। इसके बावजूद कई डॉक्टर धड़ल्ले से ब्रांड नाम से मरीजों को दवाएं लिख रहे हैं। जबकि, ओपीडी में उपलब्ध दवाओं की सूची भी चस्पा है। ऑनलाइन दवाएं देखने की भी व्यवस्था है। ब्रांड नाम लिखा होने से कई बार दवा काउंटर पर बैठा फार्मासिस्ट भी समझ नहीं पाता है कि इसका सॉल्ट क्या है। इस वजह से मरीजों को दवाएं नहीं मिल पाती हैं। वहीं, ब्रांड नाम से लिखी अधिकतर दवाएं कॉलेज में होती ही नहीं हैं। मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ती है। इससे कुछ डॉक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है। यह बात किसी से छुपी नहीं है।
मरीज का दर्द
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कुछ दिनों से खांसी आ रही थी। इस वजह से मेडिकल कॉलेज दिखाने आया था। डॉक्टर ने जो दवाएं लिखी हैं, वह यहां नहीं हैं। बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। - कुंदन सिंह, समथर।
किडनी की समस्या का उपचार कराने के लिए मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में दिखाया। सिर्फ बीपी की ही दवा मिली है। खून बढ़ाने व ताकत की दवा नहीं मिली। - सावित्री शर्मा, प्रेमनगर।
कुछ दिनों पहले हार्ट अटैक आया था। मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। ओपीडी में दिखाने के बाद डॉक्टर ने छह दवाएं लिखी हैं। काउंटर से दो ही मिली हैं। - नरेंद्र सिंह, चिरगांव।
आयुष्मान योजना का पात्र तक परेशान
बबीना निवासी कैलाश का आयुष्मान का गोल्डन कार्ड बना हुआ है। कैलाश ने बताया कि उन्हें चार महीने पूर्व हार्ट अटैक आया था। परिजनों ने उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया। आयुष्मान योजना का पात्र होने के बावजूद उनसे दवाओं और जांचों के पैसे लिए गए। कार्ड का उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। मंगलवार को वह ओपीडी में दिखाने आए तो डॉक्टर ने पर्चे पर पांच दवाएं लिखीं, जिसमें से दो ही मिली। उन्होंने बताया कि वह बेलदारी का काम करते थे। हार्ट अटैक आने के बाद वह भी छूट गया। पैसे कमाने का कोई साधन नहीं है। ऐसे में बाहर से दवाएं खरीदना उनके बस की बात नहीं है।
अस्पताल में उपलब्ध दवाओं की सूची चस्पा करा दी गई है। वार्ड और इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को ज्यादातर दवाएं मिल रही हैं। ओपीडी में मरीजों को पूरी दवाएं दे पाना संभव नहीं है। - डॉ. हरीशचंद्र आर्या, सीएमएस।