झांसी। कुल्फी वाले के हॉर्न की आवाज सुनते ही मन्नू व तीन चार और बच्चे दौड़कर उसके पास पहुंच गए। लेकिन, वह कुल्फी मांगने की हिम्मत नहीं जुटा सके, क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। जबकि, पहले वह एक ही दिन में कई कुल्फियां खा लेते थे।
इसके लिए उन्हें पैसे नहीं देने पड़ते थे, बल्कि घर से बर्तन में अनाज लाकर कुल्फी वाले को दे देते थे। लेकिन, इस बार घर में न अनाज है और न ही पैसे। ग्रामीण क्षेत्रों में सूखे ने मासूमों के मुंह की मिठास भी छीन ली है। इक्का-दुक्का फेरी वाले ही गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। वरना, पहले तो कतार लगी रहती थी।
चैत्र में कटाई शुरू होने के साथ ही गांव-गांव में फेरी वाले नजर आने लगते थे। किसी की साइकिल के कैरियर पर आइसक्रीम की पेटी बंधी होती थी, तो कोई आगे हैंडल पर टंगी पेटी में टॉफी, गजक, नमकीन आदि जैसी बच्चों की पसंदीदा सामग्री भरकर चलता था।
केवल दो महीने के धंधे में फेरी वालों का साल भर के अनाज का इंतजाम हो जाता था और हाथ में नकदी भी आ जाती थी। लेकिन, इस बार फेरी वालों के झोले और हाथ खाली हैं। ग्राम पंचायत गढ़मऊ के मजरे गांधी नगर में साइकिल पर पेटी बांधकर कुल्फी बेचने आए श्याम बाबू ने बताया कि वह कानपुर देहात के रहने वाले हैं।
पिछले दस सालों से झांसी के गांवों में आकर फेरी लगाकर कुल्फी बेचते हैं। यहां पाल कालोनी में कमरा किराये से लेकर रहते हैं। दो महीने में ही साल भर के अनाज का इंतजाम हो जाता था। इसके अलावा हाथ में नकद आठ-दस हजार रुपये भी बच जाते हैं। सुबह वह चार खाली थैले लेकर निकलते थे और शाम तक सभी भर जाते हैं। लेकिन, इस बार एक थैला भरना भी मुश्किल हो रहा है।
बच्चों को बुलाने के लिए वह हॉर्न बजाते हैं, बच्चे आते भी है, लेकिन वह कुल्फी नहीं खरीद पाते हैं। सूखे की आग में केवल श्यामबाबू अकेले ही नहीं झुलस रहे हैं, बल्कि उनके जैसे तमाम फेरी वाले हैं, जो इस बार गांवों से खाली हाथ लौट रहे हैं।