फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नीलामी : 21 साल से बंद पड़ी सूती मिल, दो अरब 66 करोड़ हो गई देनदारी

विज्ञापन
विज्ञापन
झांसी। लगातार घाटे के चलते 21 साल पहले उप्र राज्य वस्त्र निगम कताई मिल (सूती मिल) पर ताला डाल दिया गया था। हैरत की बात यह है कि तब से बंद पड़ी मिल पर बैंकों व कर्मचारियों का दो अरब 66 करोड़ रुपये बकाया हो गया है। इसके भुगतान के लिए अब मिल को नीलाम करने की तैयारी है। मिल बंद होने से उस वक्त एक साथ 2,346 कर्मचारी बेरोजगार हो गए थे।
विज्ञापन

उत्तर प्रदेश राज्य वस्त्र निगम की ओर से साल 1977 में ग्वालियर रोड पर 67.69 एकड़ के विस्तृत क्षेत्रफल में सूती मिल की शुरुआत की गई थी। शुरुआत में इस मिल में लगभग चार हजार कर्मचारी तैनात थे। मिल में सूती धागों का निर्माण किया जाता था, जिसकी सप्लाई देश भर की कपड़ा मिलों में की जाती थी। लेकिन, शुरुआती मुनाफे के बाद यह मिल घाटे में जाने लगी। इससे उबारने के लिए तमाम कोशिशें की गईं, परंतु कोई कारगर साबित नहीं हुई।
20 साल तक सुचारु संचालन के बाद सन 1997 में इसके बंद होने की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। इसके साथ ही कर्मचारियों ने भी अपना नया ठिकाना ढूंढ़ना शुरू कर दिया था। अंतत: 14 मार्च 2021 को मिल के दरवाजों पर स्थायी रूप से ताले लटक गए। इसके बाद यह दुबारा शुरू नहीं हो पाई। स्थायी बंदी के दौरान मिल में 2,346 कर्मचारी कार्यरत थे। मिल बंद होने से सभी बेरोजगार हो गए थे। इनमें से 900 कर्मचारियों को प्रबंधन की ओर से वीआरएस दिया गया था। जबकि, 1446 कर्मचारियों को छंटनी का मुआवजा मिला था, ये सभी कर्मचारी भी वीआरएस और ग्रेच्युटी का लाभ लेने के लिए न्यायालय में लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके अलावा मिल पर बैंक ऑफ बड़ौदा समेत अन्य बैंकों की भी रकम अटकी हुई है। कुल मिलाकर 266.69 करोड़ रुपये की देनदारी है।
विज्ञापन

बकाया रकम के भुगतान के लिए मिल को नीलाम करने की तैयारी है। बता दें कि मिल की जमीन की सर्किल रेट के हिसाब से कीमत 574.20 करोड़ रुपये आंकी गई है। नीलामी से प्राप्त होने वाली रकम से बैंकों व कर्मचारियों को बकाये का भुगतान किया जाएगा।
हर चुनाव में बनती थी मुद्दा
झांसी। बंद होने के बाद सूती मिल आगे के कई सालों तक चुनाव मुद्दा बनी रही। नेता और राजनीतिक दल मिल को दुबारा से शुरू कराने के दावे और वादे के साथ जनता के बीच पहुंचते थे। इस पर उन्हें मिल के पुराने कर्मचारियों का समर्थन भी खूब मिलता था। लेकिन, मिल पर पड़े तालों को दुबारा खुलवाया नहीं जा सका।
कबाड़ हो चुकी हैं मशीनें, वीरान है परिसर
झांसी। मिल को तीन शिफ्टों में में चलाया जाता था। इसके इर्दगिर्द दर्जनों खान-पान की दुकानें हुआ करती थीं, जो दिन-रात खुलती थीं। कर्मचारियों के लिए मिल में आवासीय परिसर अलग से था। इसके अलावा तमाम कर्मचारी आसपास के क्षेत्रों में किराये से मकान लेकर रहते थे। लेकिन, अब मिल में लगीं मशीनें कबाड़ में हो चुकी हैं, जबकि परिसर में जगह-जगह झाड़ियां व पेड़ उग आए हैं। परिसर वीरान बना हुआ है।
यह भी हो चुकी हैं कोशिशें...
- साल 2018 में सहकारी मिल्स संघ लिमिटेड ने सूती मिल को दुबारा शुरू करने का प्रस्ताव भेजा था, परंतु यह आगे नहीं बढ़ पाया। सर्वे में सामने आया था कि मिल के नाम पर जमीन ही शेष हैं। मशीनें कबाड़ हो चुकी हैं और बिल्डिंग भी किसी काम की नहीं बची है।
- आवास विकास परिषद ने भी मिल की जमीन पर कॉलोनी विकसित करने का मन बनाया था, लेकिन कीमत अधिक होने की वजह से बाद में परिषद ने कदम पीछे हटा लिए थे।
- जेडीए की ओर से मिल की जमीन खरीदकर उसमें कॉलोनी बनाने में दिलचस्पी दिखाई थी। लेकिन, योजना परवान नहीं चढ़ सकी। हालांकि, अब एक बार फिर जेडीए मिल की जमीन लेकर टाउनशिप बनाने की योजना बना रहा है।
सूती मिल को लेकर न्यायालय में मामले विचाराधीन है। मिल को लेकर किसी भी तरह की कार्यवाही न्यायालय के आदेश पर ही अमल में लाई जाएगी।
- मनीष चौधरी, उपायुक्त उद्योग
विभिन्न देयकों के भुगतान के लिए कर्मचारी न्यायालय में पिछले बीस साल से लड़ाई लड़ रहे हैं। निचली अदालत ने कर्मचारियों के हित में फैसला आया है। सुप्रीम कोट में वाद जारी है।
विज्ञापन

- ओपी शर्मा, महामंत्री- सूती मिल कर्मचारी संघ
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें