संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। मदरसा अल जमियतुल राज्जाकिया सोसाइटी के तत्वावधान में पुलिया नंबर नौ स्थित आस्तान-ए-सरकारे बांसा और आपिया हुजूर में सूफी मोहम्मद अफराज हुसैन सिद्दीकी की सदारत में शहादत-ए-हुसैन और पैमाम-ए-करबला कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में करबला के किस्से को बयां किया गया।
कांफ्रेंस में उलेमाओं ने बताया कि हजरत इमाम हुसैन ने मुल्क या हुकूमत के लिए जंग नहीं की बल्कि इंसानियत के लिए ही खुद को कुर्बान कर दिया। जंग में शामिल बच्चे, बूढ़े, जवान और औरतों पर बेइंतिहा जुल्म किया जा रहा था। लेकिन पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे ने शहीद होकर इस्लाम को बचा लिया था। बताया कि यह जंग दो शख्सियत की जंग नहीं थी। यह हक और बातिल की जंग थी। उलमाओं ने कहा कि यजीद जुल्म का पुतला था जबकि हुसैन सब्र के पैरोकार थे। हाफिज मोहम्मद अजीज निजामी ने बताया कि करबला में लड़ी गई जंग की मुख्य वजह यजीद था। अपनी हुकूमत के विस्तार के लिए यजीद हजरत इमाम हुसैन को अपने खेमे में लाना चाहता था। लेकिन हजरत इमाम हुसैन को यह मंजूर नहीं था। इस मौके पर मौलाना हाशिम, कारी अबरार, हाफिज कारी जमील, मुफ्ती इमरान, हाफिज सलीम, हाफिज रिजवान, हाफिज सलमान, हाफिज मुबारक, ने शहादत-ए-इमाम का जिक्र किया।