समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में चल रहे उठापटक के कारण कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह के साथ जाएं या उनके भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खेमे में खड़े हों। ज्यादातर नेता भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। इन हालातों में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा संगठन की गतिविधियां ठंडी पड़ गई हैं।
समाजवादी पार्टी में सियासी घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह को मंत्री मंडल से बर्खास्त किया, तो इसके तुरंत बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश के करीबी प्रो. रामगोपाल यादव को पार्टी से चलता कर दिया। सपा दो फाड़ की कगार पर है। बावजूद, कार्यकर्ता अब भी खुलकर किसी भी खेमे में खड़े होने से बच रहे हैं। वह अभी हवा का रुख भांप रहे हैं।
कमोबेश यही स्थिति पार्टी के ज्यादातर नेताओं की भी है। अखिलेश व शिवपाल में से वह किसके साथ हैं, वह इस सवाल के जवाब से बच रहे हैं। सपा के प्रदेश सचिव संत सिंह सेरसा व पार्टी नेता आर पी निरंजन इस मसले पर कुछ भी कहने से कन्नी काट गए। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मीरा विष्णु राय भी बचती नजर आईं। उन्होंने कहा कि उनकी आस्था सपा में है और आगे भी रहेगी।
पार्टी में जारी शह - मात के खेल का असर धरातल पर भी नजर आने लगा है। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता ऊहापोह की स्थिति में हैं। इससे विधानसभा चुनाव की तैयारियों में सपा अन्य दलों से लगातार पिछड़ती जा रही है।
सांसद का इशारा, विधायक दो टूक
झांसी। सांसद डा. चंद्रपाल सिंह यादव खुलकर कुछ भी कहने से बचे, लेकिन उन्होंने रामगोपाल के निष्कासन को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए अपनी आगे की सियासी गणित का इशारा जरूर कर दिया। उन्होंने कहा कि बड़े संघर्ष के साथ पार्टी खड़ी की गई थी, लेकिन आज जो स्थिति बन गई है वह आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से अच्छी नहीं है। इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ेगा। हालांकि, गरौठा विधायक दीपनारायण सिंह यादव ने दो टूक लहजे में स्पष्ट कर दिया कि वह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ हैं। इसमें किसी तरह के भ्रम की स्थिति ही नहीं है।