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समाज की कुप्रथा बेटी के जन्म के साथ बढ़ा रहीं हैं चिंता

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झांसी। समाज की कुप्रथाएं अब वक्त से पहले अपना असर दिखाने लगी हैं। समाजशास्त्री और मनोचिकित्सकों के अनुसार बेटियों के स्तर में सुधार के बावजूद दहेज अभी भी बदले हुए स्वरूप में अभिशाप बना हुआ है। साथ ही वारिस, बेटी की परवरिश, सुरक्षा की चिंता भी लोगों को सता रही है। बृहस्पतिवार को चौथी बेटी होने पर ललितपुर के ग्राम धुरवारा निवासी विनोद द्वारा आत्महत्या के पीछे भी यही बड़े कारण माने जा रहे हैं।
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विनोद खुद युवा था। पिता के पास छह एकड़ जमीन थी। एक छोटा भाई। परिवार में सभी सौहार्द से रहते थे। लेकिन विनोद बेटियों से ज्यादा खुश नहीं रहता था। चौथी बेटी होते ही उसने अपनी जिंदगी खत्म कर ली। इस संबंध में बीकेडी के समाजशास्त्र विभाग के डॉ. जितेंद्र तिवारी ने कहा कि बेटी की सुरक्षा, उनकी परवरिश्र अपनी हैसियत से ज्यादा रुपये शादी में खर्च करने का कहा-अनकहा दबाव बेटी के पिता पर रहता है। मासूम बच्चियों से लेकर युवतियों, महिलाओं के साथ आए दिन होने वाले यौन अपराध भी बड़ा कारण हैं। इनका डर बेटी के जन्म लेते ही सताने लगता है। यह इस कदर बढ़ गया है कि बेटी का जन्म होते ही लोग तनाव में आने लगते हैं। न चाहते हुए भी बेटी उन्हें बोझ लगने लगती है। चौथी बेटी होने पर विनोद को लगा होगा कि अब उसकी और उसके परिवार की जिंदगी कैसे चलेगी। हार कर उसने घातक कदम उठा लिया होगा।
मनोचिकित्सक डॉ.अमन किशोर भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने कहा कि समाज में वंश वृद्धि और मोक्ष के लिए पुत्र की चाह प्रबल है। बेटी की जिम्मेदारियां आज भी बड़ी चुनौती मानी जाती हैं। वारिस के लिए बेटे की ख्वाहिश में जब बार-बार बेटी जन्म लेती है तो व्यक्ति को लगता है कि वो जिंदगी से हार रहा है। उसकी चिंता अवसाद और मनोविकार में बदलने लगती है। अंतत: वह अपना और अपने परिवार का भला-बुलरा सोचे बिना मौत को गले लगा लेता है।
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बुंदेलखंड में लड़कियों का औसत बहुत कम
बुंदेलखंड क्षेत्र में लड़कों की तुलना में लड़कियों का औसत काफी कम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के सैंपल सर्वे के अनुसार झांसी व आस पास के क्षेत्र में 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों (सेक्स रेश्यो एट बर्थ) का आंकड़ा प्रति1000 लड़कों पर 815 लड़कियों के आसपास है। यही कारण है कि तमाम सख्त कानूनों के बावजूद झांसी में अवैध रूप से लिंग परीक्षण और गर्भपात होते हैं। दूर-दूर से लोग इस काम के लिए यहां आते हैं।
कोरोनाकाल की तरह शादी के लिए भी बने गाइडलाइन
समाजशास्त्री डॉ. जितेंद्र तिवारी के अनुसार लाखों-करोड़ों रुपये बेटी की शादी पर खर्च का चलन समाज में है। यह अभिशाप है। जिस तरह सरकार ने कोरोना काल में शादी में लोगों की संख्या व अन्य गाइडलाइन जारी कीं उसी तरह सरकार शादी के खर्च को भी नियंत्रित करे। इससे बदलाव आएगा।
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