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सपने दिखाए आसमानी, ‘लाखों’ हुए पानी

Thu, 15 Dec 2016 12:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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medical college jhansi - फोटो : demo
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महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में डेढ़ करोड़ रुपये की कोबाल्ट मशीन सालों तक डब्बा बनी रखी रही और अब इसके सोर्स की क्षमता 50 फीसदी से भी कम होने से अनुपयोगी हो गई। इससे शासन का यह पैसा कचरा हो गया, साथ ही कैंसर मरीजों को सिकाई कराने के लिए शहर से बाहर दौड़ना पड़ा। अब मशीन के सोर्स को नष्ट करने के लिए करीब 15 लाख रुपये खर्च होंगे।
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कैंसर के मरीजों का तीन स्तर पर इलाज चलता है। पहला सर्जरी, दूसरा रेडिएशन और तीसरा कीमोथेरेपी। झांसी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी और कीमोथेरेपी तो होती है लेकिन करीब नौ साल से सिकाई के लिए मरीजों को कानपुर मेडिकल कॉलेज और लखनऊ के एसजीपीजीआई जाना पड़ रहा है। तत्कालीन कॉलेज अधिकारियों की बेरुखी का ही यह नतीजा रहा कि अब कोबॉल्ट मशीन के सोर्स की क्षमता कम जाने से यह अनुपयोगी हो गई है। सोर्स का समय भी पांच साल होता है। ऐसे में एटॉमिक एनर्जी रेगुलरटी बोर्ड (एईआरबी) ने मेडिकल कॉलेज से इसे नष्ट करवाने को कहा है। अब इसको नष्ट करने में 15 लाख रुपये खर्च होंगे। वहीं, नए सोर्स की खरीद में भी 60 से 70 लाख रुपये लगेंगे।

स्टाफ की वजह से डब्बा बनी रही
कोबॉल्ट मशीन सन 2006 में खरीदी गई थी। वर्ष 2007 में इसको शुरू किया गया। एक साल चलने के बाद यह मशीन स्टाफ का टोटा होने से डब्बा बन गई। मौजूदा समय में दो डॉक्टर, दो कंसल्टेंट, एक मेडिकल फिजिशिस्ट की तो तैनाती है लेकिन रेडियोथैरेपी टेक्नीशियन की नियुक्ति अब तक नहीं हो सकी है। इस कारण शासन की सोच धरातल पर औंधे मुंह गिर पड़ी।
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हफ्ते में पांच दिन होती सिकाई
कोबॉल्ट मशीन से कैंसर मरीजों की सिकाई सप्ताह में पांच बार की जाती है। यह कोर्स 30 से 35 सिकाई तक चलता है। ऐसे में जो मरीज शहर से बाहर सिकाई कराने गए, उन्हें बहुत परेशानी झेलनी पड़ी। पीजीआई में प्रति सिकाई सात से आठ हजार रुपये लगते हैं, जबकि कानपुर मेडिकल कॉलेज सात सौ रुपये। वहीं, निजी अस्पतालों में तो 20 से 25 हजार रुपये खर्च होते हैं।

सप्ताह में मरीजों के हुए हजारों खर्च 
जो मरीज कानपुर और लखनऊ में सिकाई कराने गए, उन्होंने फीस के अलावा हजारों रुपये खर्च करने पड़े। चूंकि, सप्ताह में पांच दिन सिकाई करवानी है, ऐसे में मरीजों को वहां रुकने का किराया भी खर्च करना पड़ा। कम से कम मूल्य की बात करें तो दो सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मरीजों को किराए पर रहने लगा। इसके अलावा पूरे दिन में 150 रुपये का खाना खाया और कानपुर तक जाने-आने में 400 रुपये खर्च किए। ऐसे में मरीज को सप्ताह में कानपुर जाकर झांसी वापस आने में करीब 2200 रुपये खर्च करने पड़े। इसमें सिकाई फीस को नहीं जोड़ा गया है। यदि साथ में एक तीमारदार गया तो मरीज पर प्रति सप्ताह साढ़े चार हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च को बोझ पड़ा।

चावल के दाने के बराबर होता सोर्स
कोबाल्ट मशीन में लगा सोर्स चावल के दाने के बराबर मेटल होता है। यह बहुत ही खतरनाक होता है। इसे बेहद सावधानी से निकालना पड़ता है। बताया गया कि सेल को उस जगह नष्ट किया जाता है, जहां मनुष्य और जानवर न हों। अधिकतर इसको समुद्र में ले जाकर नष्ट किया जाता है।

जानिए कोबाल्ट मशीन को
कोबाल्ट एक रेडियोएक्टिव मैटेरियल का नाम होता है। यह मशीन में होता है। इसलिए मशीन का नाम भी कोबाल्ट रखा गया। यह मशीन कैंसर मरीज के सिकाई में इस्तेमाल की जाती है। मशीन के सोर्स से निकलने वाली रेडियोएक्टिव किरणें मरीज की कैंसर सेल के डीएनए पर हमला करती हैं। हमले से सेल धीरे-धीरे टूटने लगती है और कुछ समय बाद मरीज कैंसर मुक्त हो जाता है। 

कंसल्टेंट, फिजिशिस्ट की तैनाती हो गई है। टेक्नीशियन की जरूरत है। इसके लिए शासन को पत्र लिखा गया है। अब फिर से रिमाइंडर भेजा जाएगा। - डॉ. एनएस सेंगर, प्राचार्य 
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