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‘दीदी’ अपनों का भी दुख दर्द देख लीजिए

Thu, 09 Jun 2016 02:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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uma bharti, jhansi news - फोटो : demo
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लोकसभा चुनाव में जैसे ही नारा गूंजा ‘नरेंद्र मोदी काशी से और उमा भारती झांसी से’ तो झांसी- ललितपुर के लोगों को लगा अब जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। पर, इस सपने को टूटने में ज्यादा देर नहीं लगी। चुनाव जीतने के बाद दीदी की बीमारी की खबर सुनकर लोगों को निराशा हुई पर उन्हें इस बात का सब्र था कि स्वस्थ होते ही यहां की व्यवस्थाएं और विकास दोनों स्वस्थ हो जाएंगे।
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केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने पर तो इस संसदीय क्षेत्र की जनता के सपनों को पंख लग गए। वक्त गुजरा और धीरे-धीरे हकीकत सामने आई, दीदी के दर्शन भी दुर्लभ हो गए। अब लोगों की जुबान पर सिर्फ एक ही बात है दीदी सारे देश पर नजरे इनायत कर रही हो, कम से कम एक नजर अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के दुख दर्द पर डाल लीजिए।   

 झांसी। झांसी - ललितपुर संसदीय क्षेत्र से उमा भारती के भाजपा प्रत्याशी बनने के साथ ही क्षेत्रीय जनता के मन में विकास की नई तस्वीरें उभरने लगीं थीं। चुनाव जीतकर उमा के केंद्र में मंत्री बनते ही इन उम्मीदों को पंख लग गए थे। लोगों को आशा थी कि केंद्र सरकार में ताकतवर हैसियत रखने वाली उमा क्षेत्र के विकास की नई इबारत लिखेंगी। लेकिन, अब दो साल पूरे हो चुके हैं। विकास के मामले में झांसी के हिस्से में कुछ खास नहीं आया है। यहां तक कि पुरानी योजनाएं भी गति नहीं पकड़ पाई हैँ।
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नई योजनाएं भी कागजों में कैद हैं। ऐसे में आम आदमी के मन में उभरी विकास की तस्वीरें अब धूमिल होने लगी हैं। बुंदेलखंड में दीदी के नाम से जानी जाने वाली उमा भारती बृहस्पतिवार को झांसी प्रवास पर हैं। ऐसे में जनता अपनी दीदी की ओर टकटकी लगाए हुए है और दिल से हूक उठ रही है कि ‘दीदी! झांसी पर भी नजर कीजिए’। क्षेत्र के रुके हुए विकास की ऐसी ही कुछ योजनाओं को हम आपके सामने लेकर आए हैं, जानिये इनकी हकीकत....

सीपरी बाजार ओवरब्रिज
27 सितंबर 2012 को मुख्यमंत्री ने इसके निर्माण की घोषणा की थी। 86.39 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस ब्रिज पर समूची धनराशि प्रदेश सरकार द्वारा खर्च की जा रही है। निर्माण कार्य जून 2016 में पूरा किया जाना था। 1202.37  मीटर लंबे इस ब्रिज के 122 मीटर के हिस्से का निर्माण रेलवे को करना है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने बजट भी रेलवे को दे दिया है। लेकिन, रेलवे द्वारा देरी से काम शुरू किए जाने की वजह से अब यह मार्च 2017 में पूरा हो पाएगा। ऐसे में शहर के लोगों को अभी नौ माह और आवागमन में परेशानी झेलनी होगी।

केन-बेतवा लिंक परियोजना
लगातार सूखे के संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड के लिए उत्तर प्रदेश की केन नदी व मध्यप्रदेश की बेतवा नदी के गठजोड़ को वरदान माना जा रहा था। उमा भारती ने जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्री का पदभार संभालने के साथ ही इस दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया था, लेकिन अब तक पानी की यह योजना कागजों में ही सीमित है। स्थिति यह है कि उक्त परियोजना में हो रही देरी के लिए अब तो उमा भारती को भी अनशन की धमकी देनी पड़ी है।

हवा में ही रह गया हवाई अड्डा
झांसी में हवाई अड्डे की स्थापना की कवायद पिछले एक दशक से जारी है। लेकिन, इसमें तेजी तब आई थी, जब फरवरी 2013 में एयरपोर्ट अथारिटी आफ इंडिया की टीम ने इसके लिए प्रस्तावित जमीन का स्थलीय व हवाई सर्वे किया था।

इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने सदर तहसील के ग्राम सफा व चमरौआ में 200 हेक्टेअर भूमि भी चिह्नित कर ली थी। इसका प्रस्ताव एयरपोर्ट अथारिटी को भेज दिया गया था। लेकिन, अब यह योजना भी ठंडे बस्ते में है। एयरपोर्ट की स्थापना के लिए सुगबुगाहट तक होती नजर नहीं आ रही है।


 स्मार्ट सिटी से भी मिली निराशा
महानगर को केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी मिशन योजना में शामिल कराने को पिछले वर्ष जोरशोर से कवायद शुरू की गई थी। इसे लेकर नगर निगम व भाजपा के नुमाइंदों ने स्थानीय जनता को खूब सब्जबाग भी दिखाए थे। अपने नगर को स्मार्ट बनाने के लिए जनता बढ़चढ़ कर आगे आई थी। इसी का नतीजा था कि झांसी देश में तीसरे पायदान तक पहुंच गया था। इसके अलावा उम्मीद थी कि केंद्र में उमा भारती के रूप में झांसी का ताकतवर प्रतिनिधित्व होने की वजह से झांसी पहले दौर में स्मार्ट बन जाएगी। लेकिन, यहां भी नाउम्मीदी ही हाथ लगी। अब एक बार फिर झांसी इस दौड़ में शामिल है।

एक दशक से अधूरा है फ्लाई ओवर
ईस्ट वेस्ट कॉरीडोर फोरलेन सड़क परियोजना के अंतर्गत एन एच 25 के झांसी बाईपास पर बनने वाले फ्लाई ओवर का निर्माण कार्य 13 अक्तूबर 2006 को सेना की आपत्ति के चलते बंद कर दिया गया था। जबकि, इससे पहले ग्वालियर - झांसी राजमार्ग से ऊपर की ओर जाने वाले शिवपुरी- कानपुर हाईवे पर बनने वाले इस फ्लाई ओवर का आधे से ज्यादा निर्माण कार्य पूरा हो चुका था। यह फ्लाई ओवर अब भी अधूरा ही पड़ा हुआ है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय तक कागजी घोड़े दौड़ चुके हैं, लेकिन कोई हल नहीं निकल पाया है।  


अधूरा रह गया बुंदेलखंड पैकेज  
लगातार कई वर्षों तक सूखे की विभीषिका में तपने के बाद बुंदेलखंड को तत्कालीन केंद्र सरकार साल 2011 में 7,466 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज दिया गया था। इसमें से 3606 करोड़ रुपये यूपी के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड के जनपदों के लिए तय किए गए थे। लेकिन, इसमें से 49 फीसदी धनराशि ही मिल पाई है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद बुंदेलखंड विशेष पैकेज के नाम पर अब तक एक पाई भी आवंटित नहीं की गई है, जिससे बुंदेलखंड की खुशहाली की यह योजना अधूरी ही पड़ी हुई है।


सपना ही रह गई पेयजल महायोजना
महानगर को अगले चालीस सालों तक पेयजल संकट का सामना न करना पड़े, इसके लिए वर्ष 2001 में पेयजल महायोजना बनाई गई थी। डेढ़ दशक तक कागजों में गोते खाती रही इस योजना के उमा भारती को झांसी का प्रतिनिधित्व मिलने के बाद साकार होने की उम्मीद जग गई थी। केंद्र ने इसे अमृत प्रोजेक्ट में शामिल कर लिया है। लेकिन, अब भी यह योजना धरातल से दूर है। इसके अभाव में महानगर की एक बड़ी आबादी को गंभीर पेयजल किल्लत का सामना करना पड़ रहा है।

नहीं चली ग्वालियर-इंदौर इंटरसिटी
ग्वालियर - इंदौर इंटरसिटी चलाने की घोषणा वर्ष 2013 के रेल बजट में की गई थी। यहां रेलवे के पास 26 कोच की वाशिंग पिट न होने की वजह से यह गाड़ी नहीं चल पा रही थी। लेकिन, अब यह कमी भी पूरी कर ली गई है, लेकिन अब भी गाड़ी का संचालन शुरू नहीं हुआ है।

जबकि, इसके लिए स्थानीय लोगों द्वारा लंबा जनांदोलन चलाया गया था। उमा भारती को भी समस्या बताई गई थी। उन्होंने भरोसा भी दिया था, इसके बाद भी  यह ट्रेन नहीं चल पाई है।
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