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Jhansi News: न संघर्ष से डरती है और न हालात से हारती है... क्योंकि वो मां है

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मदर्स डे पर विशेष
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सुपर इंट्रो:
वो मां है... अपने बच्चों के लिए वह सब कुछ कर सकती है। एक ओर अपनी ममता और प्यार से वह पूरे घर में रौनक कर देती है, तो दूसरी ओर अगर परिवार और बच्चों पर कोई संकट आए तो डटकर उसका सामना भी करती है। जब बात अपने लाडले और लाडली के भविष्य और उनके सपनों को पूरा करने की आती है तो वो मां ही होती है, जो न संघर्ष से डरती और न ही हालात के आगे हार मानती है। मदर्स डे पर आज हम कुछ ऐसी ही मम्मियों की कहानी आपको बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर अपनी बेटियों को फलक तक पहुंचाया। किसी से सिलाई करके बेटी के कॅरिअर को ऊंचाई दी तो किसी ने स्कूल में मिड डे मील बनाकर अपनी बेटी के हाॅकी खेलने के सपने को पूरा किया। पढि़ए बसु जैन विशेष रिपोर्ट....।

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सिलाई करके बेटी को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया
दतिया गेट बाहर निवासी नेशनल मल्लखंभ खिलाड़ी रिया साहू की सफलता के पीछे उनकी मां लता साहू का संघर्ष जुड़ा है। रिया बताती हैं कि साल 2022 में उनके पिता की कोरोना के चलते मौत हो गई। इस वक्त रिया के राज्य स्तर पर ट्रायल चल रहे थे। पिता की मौत के बाद आर्थिक संकट होने के चलते हिम्मत न हुई कि घर में खेल और अपनी प्रतिभा के बारे में बात कर सके। एक दिन उन्होंने मां को अपने सपने के बारे में बताया। मां ने घर में सिलाई शुरू की और बिटिया को अभ्यास के लिए भेजना शुरू किया। इसके बाद रिया ने तमिलनाडु में खेलो इंडिया प्रतियोगिता में कांस्य मेडल पाया और नेशनल प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल पाया। लता साहू कहती हैं कि बेटी का सपना ही मेरे लिए सब कुछ है। जब उसे सफल होता देखती हूं तो लगता है कि मेरी तपस्या पूरी हुई।
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बेटियों के सपनों को पूरा करने के लिए सारिका ने किया संघर्ष
महानगर के सीपरी बाजार निवासी सारिका शाक्य ने अपनी बेटियों के सपनों को पूरा करने के लिए हालात से हार नहीं मानी। वे बताती हैं कि दो साल पहले परिवार में आर्थिक संकट आया। दोनों बेटी कशिश और अनुष्का की पढ़ाई बंद हो गई। इसके बाद खुद काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद महानगर के एक स्कूल में मिड डे मील बनाने का काम मिला। स्कूल से होने वाली आय से कुछ तंगी दूर हुई तो बेटियों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराई। छोटी बेटी अनुष्का शाक्या को हॉकी में रुचि थी तो उसे प्रशिक्षण दिलाना शुरू किया। अनुष्का लखनऊ, बनारस, गोरखपुर समेत प्रदेश में कई जगहों पर खेल चुकी हैं। मौजूदा समय में वह एमपी हॉकी अकादमी ग्वालियर में राष्ट्रीय स्तर पर ट्रायल दे रही हैं। बड़ी बेटी कशिश भी अब प्राइवेट जॉब करके परिवार को आर्थिक सहयोग दे रही है। सारिका शाक्या का कहना है कि परिवार और बेटियां ही सब कुछ हैं। बेटियों को मुकाम हासिल करते देख खुशी होती है।

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आठ साल से बेटी को नहीं देखा
हाल ही में भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम की कप्तान बनीं ज्योति सिंह की सफलता का राज उनकी मां माधुरी सिंह का त्याग है। माधुरी सिंह आठ साल से अपनी बेटी ज्योति से नहीं मिली हैं। माधुरी बताती हैं कि ज्योति जब 11 साल की थीं तब ही एमपी हॉकी अकादमी ग्वालियर में प्रशिक्षण लेने चली गईं। तब से वह घर नहीं लौटीं। वे बताती हैं कि कई बार त्योहार और परिवार में कोई समारोह होने पर बेटी की कमी खलती है, लेकिन उसकी मेहनत के बारे में सोचकर शांत पड़ जाती हूं। अब बिटिया यूरोप दौरे पर जा रही है। बस वीडियो कॉल पर देख लेती हूं। माधुरी सिंह बताती हैं कि बेटी की सफलता के लिए त्याग किया है।
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कढ़ाई करके बच्चों के कॅरिअर को संवारा
अपने बच्चों के लिए मां क्या कुछ नहीं कर सकती, इसका उदाहरण हैं विनीता सिंह। झांसी का नाम अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुंचाने वाली शैली सिंह की मां विनीता सिंह ने अपनी दो बेटियों और बेटे के कॅरिअर को सिलाई-कढ़ाई करके संवारा है। इसका नतीजा है बच्चे आज उनका नाम रोशन कर रहे हैं। वह बताती हैं कि शैली बचपन से ही खेलने की शौकीन थी और देश में अपना मुकाम बनाना चाहती थी। उसने खेतों में प्रैक्टिस की। मैंने भी कभी रोक-टोक नहीं की। आज शैली विश्व स्तर पर झांसी का नाम रोशन कर रही है, तो खुशी होती है। अन्य दोनों बच्चे भी पढ़ रहे हैं।
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फाेटो
56 बच्चों के लिए मां से बढ़कर हैं टीचर दीदी
शहर से सटे गांव दातार नगर परवई के प्राथमिक स्कूल की सहायक अध्यापिका ऊषा द्विवेदी स्कूल के 56 बच्चों के लिए मां से बढ़कर हैं। अगर एक दिन भी वह विद्यालय नहीं आतीं तो बच्चे परेशान हो जाते हैं। जब वे बीमार होती हैं, तो गांव से उनको घर तक देखने आते हैं। ऊषा द्विवेदी बताती हैं कि उनकी स्कूल में 2012 में तैनाती हुई थी। गांव में कबूतरा डेरा (कच्ची शराब बेचने का काम) है। कबूतरा डेरा के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। ऊषा द्विवेदी ने स्कूल में मनोरंजक गतिविधियां शुरू कीं, तो बच्चे स्कूल आने लगे। अब इन बच्चों के लिए ऊषा द्विवेदी सब कुछ हैं। ऊषा द्विवेदी बताती हैं कि वे बच्चों की हर तरह से मदद करती हैं।
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