झांसी। बुंदेलखंड राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय में गंभीर वैरीकोज, यूरिक एसिड, एक्जिमा, सोरायसिस, बाल उड़ने का लीच (जोंक) थैरेपी व रक्त मोक्षण (ब्लड लेटिंग) पद्धति से उपचार शुरू हो गया है। अभी तक कॉलेज में इनसे रोगियों का उपचार नहीं हो रहा था। करीब तीन माह पहले लीच थैरेपी व रक्त मोक्षण पद्धति से उपचार शुरू किया है। इसके काफी अच्छे परिणाम आ रहे हैं, जिसके चलते जल्द ही इन बीमारियों की अलग से ओपीडी शुरू करने की तैयारी है।
आयुर्वेद कॉलेज की डॉ. अर्चना कुशवाहा ने बताया वैरीकोज, एक्जिमा, सोरायसिस और सिर से बाल उड़ने की समस्या का निदान करने के लिए विशेष किस्म की लीच (जोंक) को चिह्नित स्थान पर लगाया जाता है। लीच खराब खून (टॉक्सिक) को चूस लेती है और अपनी लार के माध्यम से कई एंजाइम शरीर में छोड़ती है, जिससे रोगी को लाभ होता है। उन्होंने बताया कि यूरिक एसिड, एक्जिमा, सोरायसिस आदि में रक्त मोक्षण किया जाता है। इसमें विशेष किस्म कि निडिल (सुई) का इस्तेमाल होता है। इसके माध्यम से टॉक्सिक ब्लड को निकाला जाता है। जब टॉक्सिक ब्लड पूरा निकल जाता है, तो स्राव बंद हो जाता है। पंचकर्मा विभागाध्यक्ष डॉ. कृपाराम ने बताया बीमारी की गंभीरता के हिसाब से लीच थैरेपी व रक्त मोक्षण की सिटिंग की जाती है। इनकी संख्या अधिकतम पांच से सात होती है।
0- यह जानें
वैरीकोज वेंस:- इसमें पैरों की नसें कमजोर होकर फैलती हैं या मुड़ जाती हैं। इससे नसें गुच्छे के रूप में उभरकर नीली अथवा काली दिखती हैं। यह दिक्कत लंबे समय तक खड़े होने से होती है।
2. यूरिक एसिड:- यह शरीर का प्राकृतिक अपशिष्ट पदार्थ है। इसके बढ़ने से जोड़ों में दर्द, सूजन आदि की समस्या होती है। हालांकि यह किडनी, लिवर आदि के खराब होने पर भी बढ़ता है।
3. एक्जिमा:- त्वचा पर लालिमा, सूजन और तेज खुजली होती है। जब यह बढ़ती है, तो दाने हो जाते हैं जिससे पानी जैसा द्रव निकलता है।
4. सोरायसिस:- त्वचा की ऑटोइम्यून (प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी) बीमारी है। इस बीमारी में अंदर की त्वचा समय से पहले बन जाती है और पुरानी हटती नहीं। ऐसे में त्वचा पर लाल चकत्ते और पपड़ी बन जाती है। समस्या बढ़ने पर त्वचा मोटी होती है।