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Jhansi News: गबन के 58 साल पुराने मामले में सेल्समैन को तीन साल की कैद

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अमर उजाला ब्यूरो
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झांसी। प्रेमनगर स्थित एक सहकारी समिति में 58 साल पहले हुए गबन के मामले में कोर्ट ने सेल्समैन मनोहर सिंह को दोषी करार दिया है। साथ ही अदालत ने उसे तीन साल की कैद समेत 15 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। सेल्समैन ने 6384 रुपये का गबन किया था। 42 साल पहले कोर्ट ने उसके खिलाफ आरोप तय कर दिए थे। इतने साल बाद भी सेल्समैन अपने पक्ष में न गवाह पेश कर सका, न सबूत दिखा सका। इस वजह से कोर्ट ने सेल्समैन को अमानत में खयानत का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक प्रेमनगर इलाके में पुलिया नंबर 9 उपभोक्ता सहकारी समिति संचालित होती थी। जीवनोपयोगी वस्तुओं को खरीदकर समिति अपने सदस्यों के बीच उसे सस्ते दाम में बेचती थी। इस समिति में मनोहर सिंह सेल्समैन था जबकि उसका भांजा मनोहर कोषाध्यक्ष था। भांजा मनोहर जबलपुर ऑर्डिनेंस फैक्टरी में काम करता है। ऑडिट के दौरान यह बात सामने आई कि वर्ष 1967-68 के बीच सेल्समैन मनोहर सिंह ने वस्तुओं की बिक्री का पैसा कोषाध्यक्ष के पास जमा नहीं कराया। उसने अप्रैल-जून के बीच 986 रुपये एवं जुलाई 67 से अप्रैल 68 के बीच 5393.04 रुपये का गबन किया।
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ऑडिट में इसकी पुष्टि होने पर मनोहर ने कुछ रकम लौटा दी लेकिन पूरी राशि वापस नहीं की। समिति ने अमानत में खयानत के आरोप में प्रेमनगर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस ने मनोहर के खिलाफ कुछ साल बाद चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की। 26 मार्च 1983 को कोर्ट ने मनोहर पर आरोप तय किए। इसके बाद से सुनवाई चल रही थी। वादी की ओर से समिति के चार सदस्यों को गवाह के तौर पर पेश किया गया।
सेल्समैन मनोहर उनकी गवाही मानने को राजी नहीं हुआ। कोर्ट ने उसे खुद को फंसाए जाने की बात कही लेकिन अपने पक्ष में कोई गवाह पेश नहीं कर सका। दोनों पक्षों को सुनने के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ईश्वर चरण कनौजिया की कोर्ट ने मनोहर को दोषी करार दिया।
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इनसेट
80 साल की उम्र में काटना पड़ रहा था कचहरी का चक्कर
सेल्समैन रहे मनोहर की उम्र अब करीब 80 वर्ष हो चुकी है। दिखाई एवं सुनाई भी कम पड़ता है लेकिन 58 साल पहले 6384 रुपये के गबन का मामला ऐसा गले में फंसा कि अक्सर ही कचहरी के चक्कर काटने पड़ते थे। कई बार नियमित तारीख लग जाती थी, इस वजह से कचहरी आना पड़ता था, तो कई बार महीनों बाद तारीख लगती थी। उनके परिजनों का कहना है कि कोर्ट में मामला आने के बाद हर साल कई बार कचहरी आना पड़ता था।
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