लुप्त होती जा रही है सावनी की परंपरा
झांसी। बुंदेलखंड में सावन माह में रक्षा बंधन से ठीक पहले सावनी देने की पुरानी परंपरा है। इसे ससुराल पक्ष के लोग अपनी बहू के मायके में भेजते हैं। इसमें लकड़ी के सौटा, डब्बा का बब्बा, चपेटा, चकरी, भौंरा व शक्कर की खरपूड़ी आदि सामान रहता है लेकिन, अब यह परंपरा लुप्त होने की कगार पर है। 10 साल पहले तक शहर के बिसाती बाजार में सावनी की 20 दुकानें लगती थीं लेकिन, अब इनकी संख्या चार से पांच में रह गई है।
बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक त्योहार से जुड़ी परंपराएं प्रचलित हैं। इनमें महत्वपूर्ण परंपरा रक्षा बंधन से ठीक पहले सावनी भेजना भी है। इसे ससुराल पक्ष के लोग अपनी बहू के मायके में भेजते हैं। इसके जरिये ही पहचान होती थी कि जिस घर में मायके पक्ष के लोगों ने अपनी बेटी की शादी की है, वह कितना समृद्ध है। सावनी में कई खिलौने रखे जाते हैं। इनमें दाढ़ी लगाए और चौंगा पहने बब्बा, लकड़ी, मिट्टी अथवा लाख से बने चपेटा, लकड़ी की चकरी, भौंरा, बांसुरी, अलगोजा, समधिन की प्रतीक गुड़िया, गुलटेना पेड़ की लकड़ी से तैयार रंग बिरंगे सौटा आदि रहता है। चपेटा 5 व 11 की संख्या में रहता है। जबकि डब्बा का बब्बा जिसे कई लोग समधी का रूप मानते है, सावनी का मुख्य मानक माना जाता है। इन्हें जेवरात, कपड़ा, रंग बिरंगे कलश, मिठाई के साथ भेजा जाता है। बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा के अनुसार सावनी को घर के आंगन में रखा जाता था, जिसे गांव के सभी लोग देखते थे। इसके बाद बदले में मायके पक्ष के लोग भादो माह की मौर छठ पर मौराई छठ के रूप में उसे भेजते है। यह परंपरा आज भी गांवों तथा शहर के कई परिवारों में निभाई जाती है।
जमाने के साथ बदल गई सामग्री
बदलते जमाने के साथ ही सावनी की सामग्री भी बदलती चली गई है। सावनी विक्रेता बृजेश पटवा के अनुसार अब कपडे़ की थान में लगने वाली लकड़ी सौटा के रूप में बिकने लगी है। इसमें रंगों की जगह चमकीले रंग बिरंगी कागज लगाए जाने लगे हैं। मिट्टी अथवा लाख के चपेटा भी नहीं बनते हैं। वहीं सावनी में लोग अब हेलीकाप्टर, रोबोट जैसे आधुनिक खिलौने पसंद करने लगे हैं। सावनी विक्रेता इकबाल के अनुसार शहर के बिसाती बाजार में पांच से छह साल पहले तक 20 दुकानें लगती थीं लेकिन अब इनकी संख्या 4 से 5 रह गई है। बाजार भी तीन से चार दिन तक का रहता है। शक्कर की खरपूड़ी बतासा विक्रेता सत्य प्रकाश के अनुसार पहले सावन शुरू होते ही खरपूड़ी की बिक्री बढ़ जाती थी। लेकिन अब खरपूड़ी का बाजार दो से तीन दिन का रह गया है। अब रंग बिरंगी कलरों वाले मिट्टी व पीतल के कलश भी नहीं दिखते हैं।
राछरा व कजरिया के गाए जाते हैं गीत
सावनी आने पर बुंदेली भाषा में राछरा व कजरिया गीत भी गाए जाते हैं। इसमें कामना की जाती है कि जिस तरह से ससुराल के गांव में बरसात हो रही है, इसी प्रकार से उनके भाई के गांव मेें भी बरसात हो। ताकि समृद्धि बनी रहे और फसल अच्छी हो। सावनी में ससुराल वाले राखी भी भेजते है, जो बहू अपने भाई को पहनाती है। वहीं, सावन के दौरान मायके में वह अपनी गृहस्थी के उपयोग में आने वाली वस्तुओं सिकौली, चकका आदि भी बनाती है, जो मौर छठ में भेजी जाती है।