झांसी। मुकद्दस रमजान में चांद के दीदार के अनुसार उन्तीस या तीस रोजे होने के बाद ही ईद का त्योहार मनाया जाता है। जिसके चलते रमजान के चौदहवें रोजे को मझला अर्थात मध्य का रोजा कहा जाता है। इस रोजे तक रोजेदार रोजे रखकर सब्र का आदी हो जाते हैं। चौदहवां रोेजा रोजेदारों के लिए जन्नत के दरवाजे पर सब्र की दस्तक कहा जाता है। शुक्रवार को रमजान का चौदहवां अर्थात मझला रोजा होगा।
रमजान में रोजे रखकर लोग अल्लाह की इबादत करते हैं। इस पवित्र महीने में सबाब का दर्जा सत्तर गुना अधिक होने के कारण मालदार लोग इसी महीने में जकात दान करते हैं। इसी महीने में ईद की नमाज से पहले सदका-ए-फित्र भी अदा किया जाता है। रमजान के महीने में हर कोई नेकियां कमाने के लिए आतुर रहता है। मझले रोजे को अधिकतर लोग रोजा रखकर अल्लाह तआला की इबादत करते हैं।
मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि रोजे का दूसरा नाम सब्र हैै। उन्होंने कहा कि कुरान में जिक्र है कि अल्लाह तआला सब्र करने वालों के साथ है। बताया कि जन्नत के आठ दरवाजे हैं जिसके एक दरवाजे से सिर्फ रोजेदार ही दाखिल होंगे। कयामत के दिल अल्लाह रोजेदारों को अपने दस्तरख्वान पर ही खाना खिलाएंगे।