ज्ञानपुर (भदोही)। आजादी के प्रथम संग्राम में तलवार की चमक से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देने वाली वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के विद्रोह का मुख्य कारण ओरछा (टीकमगढ़) की रानी लड़ई सरकार थी। वीरांगना के जीवन संघर्षों से जुड़े कुछ और तथ्य वृंदावन के कवि बांके मदन मोहन की अप्रकाशित कृति (सांगीत) ‘झांसी वारी रानी’ में महफूज हैं। जिले के वयोवृद्ध साहित्यकार और नागरी प्रचारिणी सभा एवं हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पूर्व साहित्यान्वेषक उदयशंकर दुबे ने कहा है कि बुंदेलखंड के कई राजाओं के तीर्थ पुरोहित रह चुके बांके मदन मोहन ने अपनी मूल हस्तलिखित प्रति में इस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है । इसी तरह रानी से जुड़े कई अन्य संस्मरणों का भी जिक्र इस अप्रकाशित पांडुलिपि में है। पांडुलिपि उनके वंशज और वृंदावन में वनखंडी महादेव राधामोहन मंदिर के पुजारी कन्हैयालाल उपाध्याय के संग्रह में अब भी सुरक्षित है।
साहित्यकार उदयशंकर दुबे बुंदेलखंड की धरती पर महारानी के जीवन दर्शन का गहन अध्ययन कर चुके हैं। झांसी की रानी के बलिदान दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि 1885 में ब्रज भाषा में लिखी गई बांके मदन मोहन की हस्तलिखित कृति (सांगीत) ‘झांसी वारी रानी’ यदि समाज के सामने आए तो में महारानी लक्ष्मीबाई से जुड़े कई नए घटनाक्रम सामने आएँगे। टीकमगढ़ की रानी लड़ई सरकार लक्ष्मीबाई से द्वेष रखती थी और झांसी राज्य पर अधिकार करना चाहती थीं।
विज्ञापन
मदन मोहन ने इसमें लिखा है कि अंग्रेजी हुकूमत ने भी लड़ई सरकार का साथ दिया। लड़ई सरकार ने अपने सेनापति नत्थे खां को झांसी पर आक्रमण के लिए भेज दिया। वह हारकर अंग्रेजों के पास इंदौर चला गया और अंग्रेजी सेना के साथ झांसी पर फिर आक्रमण किया। इस युद्ध में लक्ष्मीबाई को झांसी छोड़कर कालपी जाना पड़ा। अंग्रेजी सेना ने कालपी पर भी आक्रमण किया। विवश होकर रानी लक्ष्मीबाई ने नाना साहब पेशवा के साथ ग्वालियर पर आक्रमण कर वहां के राजा जयाजी राव सिंधिया से सेना के लिए रसद की मांग की। लेकिन सिंधिया ने रसद न देकर युद्ध चुना और हारकर महल में जा छिपा।
पांडुलिपि में बताया गया है कि सिंधिया ने सेना समेत लक्ष्मीबाई को जलाने का भी असफल प्रयास किया। उन्होंने बताया यह सब जानकारी आम लोगों को नहीं है। पुस्तक में सिंधिया के साथ महारानी लक्ष्मीबाई के वार्तालाप का प्रभावशाली वर्णन किया गया है। अंत में ग्वालियर में अंग्रेजी सेना से युद्ध करते हुए 18 जून 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। बांके मदन मोहन अंग्रेजों के विरोधी थे। उन्होंने मथुरा के अंग्रेजों का वृंदावन में गिरजाघर बनाने को लेकर विरोध किया। इससे नाराज अंग्रेजों ने उन पर मुकदमा कायम कर दिया। कई वर्षों तक संघर्ष के बाद वह केस तो जीत गए, लेकिन ‘सांगीत: झांसी वारी रानी’ प्रकाशित न हो सकी।