सदर बाजार की रामलीला में सलीम खां का महत्वपूर्ण योगदान है। वह पिछले 40 साल से रामलीला मंचों की शोभा बने हैं। वह कहते हैं कि उनका चेहरा ऐसा है कि उन पर कॉमिक पात्र ही जमता है। वह जोकर के पात्र को जीवंत करते है। उन्हें दर्शकों से बेहद प्यार और सम्मान मिलता है। यहीं कारण है कि रामलीला मंचन की शुरूआत भगवान की पूजा के बाद उनकी कलाकारी से होती है। सलीम भगवान राम का गुणगान कर एकता का संदेश दे रहे हैं।
महानगर के बकरा मंडी निवासी 64 वर्ष के सलीम बताते हैं कि रामलीलाओं में काम करना और भजन कार्यक्रमों में गाना उनका पुश्तैनी काम है। उनके पिता नफीस खां और दादा निन्नू रामलीला के बेहतरीन कलाकार थे। ग्वालियर के तत्कालीन राजा जीवाजी राव सिंधिया ने उनके दादा निन्नू को सबलगढ़ के पास दूल्हावाला गांव की जागीरदारी दे दी थी, जो आज भी उनका परिवार संभाले है।
सलीम के मुताबिक पैसे से ज्यादा दर्शकों की वाहवाही उन्हें सुकुन देती है। सभी एक दूसरे के धर्मों का सम्मान करें और राम चरित्र की खूबियों को अपनाएं, इसका वह हमेशा सभी को एकता का संदेश देते हैं। इसके अलावा रामलीला मंच की मर्यादाओं पर नए कलाकारों को जागरूक करते हैं। वह मोंठ, बांदा, तालौड़, बबेरु, महोबा सहित कई जगहों पर आयोजित रामलीलाओं में भूमिकाएं निभा चुके हैं। यह क्रम आगे भी जारी रहेगा। सदर बाजार रामलीला कमेटी के सदस्य विकास खत्री ने बताया कि सलीम सदर की रामलीला के समर्पित कलाकार हैं। वह नाममात्र के मेहनताने पर कई साल से योगदान दे रहे हैं।
पुत्र भी इसी राह पर
सलीम खां के पुत्र विशाल और मास्टर अल्लारक्खा भी अपने पिता की राह पर है। वे झांसी के अलावा बांदा, कमासिन सहित कई क्षेत्रों की रामलीलाओं में मंदोदरी, कैकई, तारा सहित कई पात्रों की भूमिकाएं निभा चुके है। इस वर्ष भी यह भूमिकाएं निभाएंगे। सभी सदस्य नियमित अभ्यास करते हैं। अधिकांश संवाद रटे हैं।