शनिवार को पुष्य नक्षत्र पर प्रशासन की बदली व्यवस्था से रामराजा मंदिर की पांच सौ वर्ष पुरानी परंपरा टूट गई। भक्तों को चरणामृत नहीं वितरित किया गया। भगवान को प्रसाद भी भक्तों ने अपने हाथ से चढ़ाया। अधिकारियों का कहना है इस व्ववस्था से भीड़ नियंत्रित होगी। भक्तों ने प्रशासन के इस फैसले का विरोध किया है। लोगों का कहना है कि प्रशासन को व्यवस्था बनाने में दिक्कत आती है इसलिए परंपरा ही तोड़ दी।
श्रीरामराजा मंदिर में शनिवार को पुष्य नक्षत्र के दिन श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वयं चढ़ाना पड़ा तो वहीं, प्रशासन ने व्यवस्थाओं के नाम पर भगवान के चरणामृत के वितरण को पूरी तरह बंद करवा दिया। पुष्य के दिन सुबह 9 बजे हुई बाल भोग आरती के बाद से ही प्रशासन द्वारा बदली व्यवस्था के चलते श्रद्धालुओं में आक्रोश देखा गया। झांसी निवासी श्रद्धालु आनंद मिश्रा का कहना है कि ओरछा की महारानी कुंअर गणेश और महाराजा मधुकर शाह के समय से करीब पाँच सौ वर्ष से चली आ रही परंपरा को प्रशासन द्वारा व्यवस्थाओं के नाम पर लगातार तोड़ा जा रहा है। इस बात को लेकर लोगों में आक्रोश है ।
इस संबंध में एडिशनल एसपी राकेश खाका ने बताया की इस तरह की व्यवस्था से भीड़ को नियंत्रित करने में आसानी हुई है और लोगों को दर्शन करने में 25 से 30 मिनिट की जगह केवल 15 मिनट ही लग रहे हैं। युवा भाजपा नेता विवेक तोमर का कहना हे कि लोगों की जान माल की रक्षा करना पुलिस का काम है लेकिन बड़ा सवाल यह की हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यताओ में चरणामृत को भगवान के चरणों का अमृत और मोक्ष दायक बताया गया है और प्रसाद को पुजारी के जरिये भगवान को अर्पित करने का भी विशेष महत्व है यह परंपरा प्राचीन है। परंपरा तोड़ने की बात मुख्यमंत्री तक पहुंचाई जाएगी।