स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा बनाईं गईं राखी।
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झांसी। पिछले वर्ष तक राखियों का बाजार चीन से आए उत्पादों से भरा रहता था लेकिन, इस बार सीमा पर बढ़ रहे तनाव ने चीन की यह हिस्सेदारी काफी घटा दी है। इसका फायदा बुंदेलखंड की महिलाओं को मिल रहा है। यहां सक्रिय करीब डेढ़ दर्जन स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने हाथों से रंग-बिरंगी राखियां बनाईं। बजट राखियां के साथ ही बेहद खूबसूरत होने की वजह से इनकी न सिर्फ झांसी में काफी डिमांड रही बल्कि ललितपुर, जालौन समेत अन्य इलाकों में भी इनको खूब पसंद किया गया।
बुंदेलखंड में ही राखियों का करोड़ों रुपयों का बाजार है। अभी तक इनमें चीनी राखियों का ही अधिक दबदबा रहता था। इस वजह से घरों में राखियां का कुटीर काम हाल के वर्षों में दाम तोड़ चुका लेकिन, सीमा पार चल रहे विवाद से इस उघोग में सांसें वापस लौटती दिखती हैं। इस बार डेढ़ दर्जन स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने अपने दम पर हाथ से बनी राखियों को बाजार में उतारा। अपनी डिजाइन एवं कम कीमत होने की वजह से यह काफी पंसद भी की गईं। उपायुक्त स्वरोजगार डॉ.नागेंद्र नारायण के मुताबिक श्रीबाला जी संघ, मां शेरवाली संघ, गंगा महिला संघ, महालक्ष्मी समूह, ठाकुर बाबा, संतोषी माता स्वयं सहायता समूह, जै वैष्णव समूह, रोशनी संघ, राधिका समूह, राधे-राधे संघ, बालाजी महिला संघ, उन्नति महिला संघ समेत अन्य महिला संघों ने जून से तैयारियां शुरू कर दी थीं। महिलाओं को डिजाइन तैयार करने में मदद की गई। डिजाइन तय होने के बाद इन समूह की महिलाओं ने बड़ी तेजी से और सधे हुए अंदाज में काम शुरू किया। प्रत्येक समूह को 5000 से अधिक राखियां बनाने का लक्ष्य दिया गया।
जुलाई का पखवारा आरंभ होते-होते राखियां तैयार होने लगीं। इनकी कीमत 10 रुपसे से लेकर अधिकतम 20 रुपये तय हुई जबकि बाजार में ऐसी राखियां न्यूनतम 50 रुपये तक में मिलती हैं। पैकिंग भी आकर्षक तरीके से की गई। ललितपुर, जालौन समेत आसपास के जनपदों में इनको भेजा गया। सरकारी कार्यालयों में भी या बिक्री के लिए उपलब्ध कराई गईं। पसंद आने पर इनकी डिमांड भी बढ़ती गई। उपायुक्त के मुताबिक इसे कम संसाधन में आरंभ किया गया है लेकिन, महिलाओं को अच्छा रिस्पांस मिला है। अगले वर्ष से इसे बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। बता दें, इनमें से कई स्वयं सहायता समूह अपने कार्यकलापों से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं।