झांसी। रेलवे अब अपने पुराने कोचों को 12 साल बाद दोबारा नया बनाकर नहीं चलाएगा। झांसी कोच फैक्टरी (कारखाने) में ऐसे कोचों की मरम्मत का काम बंद कर दिया गया है। अब सिर्फ कारखाने में कोचों की आवधिक मरम्मत (पीरिओडिक ओवरहालिंग) का काम किया जा रहा है। पटरियों पर दौड़ने वाले हर कोच की हर 18 महीने बाद ओवरहालिंग की जाती है। झांसी कारखाने में प्रतिदिन एक कोच को ओवरहालिंग कर तैयार किया जा रहा है।
पूर्व में भारतीय रेल में आईसीएफ (इंटीग्रल कोच फैक्टरी) ही चलते थे। पटरियों पर सबसे अधिक यही कोच दौड़ रहे हैं। इनको चेन्नई कोच फैक्टरी में तैयार किया जाता है। मगर रेलवे कुछ सालों से जर्मनी तकनीक के आधुनिक एलएचबी (लिंक हाफमैन बुश) का उपयोग करने लगा है। आईसीएफ कोचों का निर्माण बंद कर दिया है।
रेलवे एक कोच की उम्र 25 साल मानकर उसे 12 साल बाद दोबारा नया तैयार करवाता है। ताकि वह अपनी पूरी उम्र पूरा कर सके। इसके बाद उसे कंडम घोषित कर दिया जाता है। झांसी में भी इसी उद्देश्य से 100 करोड़ की लागत से अक्तूबर 2014 में कोच मरम्मत कारखाने को स्थापित किया था। योजना थी कि हर साल यहां से 12 साल पूरे कर चुके 250 कोच नए तैयार करके निकाले जाएंगे, लेकिन स्टाफ की कमी से ऐसा तो नहीं हो सका। बोर्ड ने अब कोचों को दोबारा नया तैयार करने पर ही रोक लगा दी है। रेलवे अफसरों का मानना है कि 12 साल बाद कोच को दोबारा तैयार करने की जगह उसे 20 साल तक ओवरहालिंग कर ही चलाया जाए। इसके बाद उसे कंडम घोषित कर दिया जाए।
फर्नीशिंग शॉप में बढ़ी शेड की लंबाई
कोच मरम्मत कारखाने में स्थित अलग- अलग शॉप में शेडों की लंबाई कम होने के कारण लाइन पर कई कोच खड़े होने के बाद भी उनकी एक साथ मरम्मत करना कर्मचारियों के लिए मुश्किल होता था। दरअसल, शेड की लंबाई कम होने के कारण कर्मचारियों को धूप में काम करना पड़ता था। दूसरा बारिश में काम नहीं हो पाता था। मगर अब यहां फर्नीशिंग शॉप से पेंटिंग शॉप के बीच शेड की लंबाई 60 मीटर बढ़ा दी गई है, जिससे कर्मचारियों को काम करने में आसानी हो गई है।