झांसी। कोविड महामारी के दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने गांव को लौटे। इनको मनरेगा के जरिए गांव में काम मुहैया कराने को कवायद हुई लेकिन, अब मनरेगा मजदूरों की संख्या में बड़ी तेजी से गिरावट आ रही है। शुरूआत में करीब 74 हजार मजदूरों को काम दिया जा रहा था। लेकिन, इस माह तक करीब 33 हजार मजदूर काम छोड़ चुके हैं। बताया जा रहा इनमें से अधिकांश मजदूर वापस लौट गए हैं। मजदूरों के काम पर न आने की एक वजह समय पर भुगतान का न मिलना भी बताया जा रहा है।
बड़ी संख्या में मजदूरों के गांव वापस लौटने से मनरेगा के कामों में बढ़ोत्तरी की गई। कई विभागों के काम मनरेगा में जोड़ दिए गए। जून महीने तक सर्वाधिक 74 हजार मजदूरों को मनरेगा में काम दिया गया लेकिन, उसके बाद से संख्या में गिरावट आने लगी। जुलाई के आखिरी सप्ताह तक यह संख्या घटकर आधी से भी कम रह गई। इस तरह करीब 33 हजार मनरेगा मजदूर काम छोड़कर चले गए। हालांकि बारिश में मनरेगा का काम काम काफी कम हो जाता है लेकिन मजदूरों के न आने की खास वजह बारिश नहीं है। बताया जा रहा कि कई गांव में मजदूर धीरे-धीरे वापस अपने रोजगार वाले स्थानों की ओर लौट रहे हैं। इस वजह से संख्या घट रही। कई जगह यह बात भी सामने आई कि मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिल रही। काफी दिन का इंतजार कराने के बाद उनको पैसा दिया जा रहा। इस वजह से भी मजदूर इसमें काम करने को राजी नहीं हैं। बता दें, मनरेगा मजदूरों के काम पर न आने से कई काम भी प्रभावित हो रहे हैं। इन दिनों मेड बंधी, जलाशय गहरीकरण कार्य कराया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 जुलाई तक 18368 मजदूरों ने काम की मांग की, जिसमें से 18357 मजदूरों को काम दिया गया। सीडीओ शैलेष कुमार का कहना है कि मनरेगा में जितने मजदूर काम मांग रहे उनमें अधिकांश को काम दिया जा रहा है। उनका दावा है कि अभी करीब 250 मजदूर ही वापस गए हैं।