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हर सांस में धूल, फेफड़े रहे फूल

Sat, 12 Dec 2015 01:01 AM IST
ब्यूरो
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झांसी। महानगर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। हवा में धूल घुल गई है। भीड़भाड़ से भरे बाजार हों या कम आवाजाही वाले रिहायशी इलाके, सभी जगह की वायु प्रदूषित हो गई है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की गई जांच में यह स्थिति सामने आई है।
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उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नगर के दो स्थानों पर प्रदूषण की जांच की गई। इसके लिए दो अलग-अलग शैली के क्षेत्रों को चुना गया। बोर्ड ने शहर के सबसे व्यस्ततम क्षेत्र मानिक चौक व कम आवाजाही वाले आवासीय क्षेत्र मेडिकल कालेज के पास स्थित वीरांगना नगर कालोनी में प्रदूषण की जांच की। दोनों ही स्थानों पर खतरनाक नतीजे सामने आए।

जांच में एसपीएम (सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर) सामान्य 200 म्यू ग्राम प्रति वर्गमीटर से मानिक चौक में 239-259 तथा वीरांगना नगर में 210-222 पाया गया। जबकि, आरएसपीएम (रीस्पाइरेबल सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर) सामान्य 100 म्यू ग्राम प्रति वर्गमीटर से मानिक चौक में 131-149 व वीरांगना नगर में 110-115 पाया गया। यह जांच मानसूनी सीजन के बाद हुई। इस समय में मिट्टी में नमी की वजह से वातावरण में धूल की मात्रा बेहद कम होती है। गर्मियों में इसमें और भी अधिक बढ़ोत्तरी हो जाती है।
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धूल के कण हैं एसपीएम व आरएसपीएम
झांसी। एसपीएम व आरएसपीएम दोनों ही धूल के कण होते हैं। एसपीएम के मुकाबले आरएसपीएम ज्यादा बारीक होते हैं। यह हवा में घुलनशील होते हैं। इनके कणों का आकार 2.5 माइक्रोन (बाल की चौड़ाई के बारहवें हिस्से से भी कम) होता है। हवा के साथ यह कण आसानी से नाक के जरिये शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।

फेफड़ों पर पड़ता है बुरा असर
झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मधुरमय शास्त्री के अनुसार धूल के यह महीन कण फेफड़ों के फंक्शन पर बुरा असर डालते हैं। इसके अलावा इनकी वजह से अस्थमा, दमा, डिप्रेशन, बेचैनी जैसे रोगों की शिकायत हो जाती है।

इन रोगों के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। बच्चे व युवा भी इसके शिकार हो रहे हैं। धूल से बचने के लिए नाक पर कपड़ा बांधना बेहतर उपाय है। इसके अलावा दिन में दो-तीन बार साफ पानी से आंखों को भी धोना चाहिए। धूल आंखों पर भी कुप्रभाव डालती है।

धूल उत्सर्जन के कई हैं स्रोत
झांसी। धूल उत्सर्जन के तमाम स्रोत हैं। गिट्टी, मिट्टी के खनन व इनके खुले परिवहन से भारी मात्रा में धूल हवा में समाहित हो जाती है। निर्माण कार्यों से निकलने वाले धूल के कण आसानी से हवा में घुल जाते हैं। जिले में लगे एक सैकड़ा स्टोन क्रशर भी खूब धूल उड़ाते हैं। इसके अलावा पारीछा थर्मल पावर से निकलने वाली राख भी वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है। वाहनों की लगातार आवाजाही की वजह से यह धूल जमीन में सेट नहीं हो पाती है।

ऐसे हो सकता है बचाव
झांसी। नियमानुसार खनिज का परिवहन खुले में नहीं किया जा सकता। बालू, गिट्टी, मिट्टी आदि को गाड़ियों में लादने के बाद ढकना जरूरी है, ताकि वह रास्ते में उड़ें नहीं। इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाकर इसकी रोकथाम की जा सकती है।

‘जांच में बाजार व रिहायशी इलाके दोनों ही स्थानों पर हवा में धूल सामान्य से कहीं अधिक मात्रा में घुली पाई गई है। इस पर नियंत्रण के जल्द ही प्रभावी उपाय किए जाएंगे।’
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- के के श्रीवास्तव, क्षेत्रीय अधिकारी - प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 
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