अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। स्कूल-कॉलेज से घर-पड़ोस तक हर जगह होली का जोश और उमंग सबके सिर चढ़ा हुआ है। शुक्रवार को हर घर होली होगी खूब रंग-गुलाल उड़ेंगे। ऐसे में होली खेलते हुए अपनों की सेहत का भी ख्याल रखना जरूरी है। खतरनाक रासायनों से बने रंग न सिर्फ त्वचा के लिए हानिकारक हैं बल्कि कैंसर जैसे जानलेवा रोगाें का भी कारण बन सकते हैं। ऐसे में फूलों से बने रंग इसका बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
बीयू के वनस्पति विज्ञान की प्रो. पूनम मेहरोत्रा ने बताया होली प्रियजन से खेली जाती है, इसलिए उनकी सेहत का जरूर ध्यान रखना चाहिए। वह बताती हैं कि सिंथेटिक गुलाल व रंग के बजाय फूलों के रंग से होली खेले। इससे न सिर्फ त्वचा में निखार आता है बल्कि सेहत भी अच्छी रहेगी। प्राकृतिक रंग बनाना बेहद आसान है।
लाल रंग गुड़हल, गुलाल व चुकदंर को मिलाकर बनाया जाता है। यदि ऐसा करना सहज नहीं है, तो पलाश के फूल को छांव में सुखा लें। सूखा रंग बनाने के लिए पीस दें। चंदन पाउडर में गुड़हल के फूल पीसकर भी लाल रंग बना सकते हैं।
हरा रंग बनाने के लिए तुलसी, नीम व पालक को सूखाकर बना सकता है। किसी के चेहरे पर लगाने के लिए आटा मिलाकर लगाएं। पीला रंग बनाने के लिए गेंदा, कनेर का फूल सुखाकर पीस लें। चंदन पाउडर भी मिला सकते हैं। इसके अलावा फूल को छांव में सुखा लें और फिर पानी में डाल दे। फूल का रंग पानी में आ जाएगा। इसके अलावा हल्दी में बेसन मिलाकर भी पीला रंग बना सकते हैं।
डॉ. नीरज श्रीवास्तव, त्वचा रोग विभागाध्यक्ष ने विभिन्न सिंथेटिक रंगों में मिले रासायन और उनसे संभावित नुकसान के बारे में बताया।
गुलाल में एस्बेस्टस या सिलिका मिलाई जाती है।
0- सिंथेटिक रंग से होने वाले नुकसान
हरे रंग में कॉपर सल्फेट होता है। इससे आंखों में खुजली, जलन या इंफेक्शन हो सकता है
बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड होता है, जिससे अस्थमा या एलर्जी होने का खतरा रहता है
सिल्वर कलर में एल्युमिनियम ब्रोमाइड होता है। एक्सपर्ट के अनुसार कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.
काला रंग में लेड ऑक्साइड होता है, जो किडनी और दिमाग पर बहुत बुरा असर डालता है।
लाल रंग में मरक्यूरी सल्फेट होता है. जिससे त्वचा और लकवा का खतरा रहता है।
नीला रंग प्रुशियनब्लू रसायन होता है, जिससे त्वचा की एलर्जी हो सकती है।