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छटपटा रहे मरीज, गड़बड़ा रहीं मशीन, आखिर कब टूटेगी शासन की नींद

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महारानी लक्ष्मीबाई मेडीकल कॉलेज ।
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छटपटा रहे मरीज, गड़बड़ा रहीं मशीन, आखिर कब टूटेगी शासन की नींद
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झांसी। सब कुछ देखकर भी अनदेखी का उदाहरण है महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज। 45 वर्षों से अधिक समय निकलने के बाद भी आज तक यहां निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए स्वतंत्र फीडर नहीं है। न इसके लिए कोई पहल मेडिकल कॉलेज प्रशासन स्तर पर हुई और न ही निरीक्षण करने आने वाले शासन के सचिव, विशेष सचिव स्तर पर। नतीजा जिंदगी-मौत से जूझते आईसीयू, बर्न वार्ड में भर्ती मरीज और करोड़ाें रुपये से खरीदी गईं एमआरआई, सीटी स्कैन, डिजिटल एक्सरे व अन्य मशीन भुगत रही हैं। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि दुनारा से मेडिकल कॉलेज तक स्वतंत्र फीडर डालने में लगभग 50 लाख रुपये खर्च आएगा। यहां यह बता देना भी जरूरी है कि हर वर्ष डीजल के मद में ही मेडिकल कॉलेज में दस लाख से अधिक खर्च हो जाते हैं।
1969 में स्थापित हुए मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के पहले बैच की पढ़ाई 1972 में शुरू हुई। तब से अब तक न जाने कितने निजाम बदल गए अंजाम वही रहा। तमाम दावों के बावजूद आज भी बिजली गुल होते ही मेडिकल कॉलेज में आईसीयू और दस बेड वाले बर्न वार्ड तक के एयर कंडीशनर बंद हो जाते हैं। इनमें लगे कुल पंखों के बमुश्किल आधे ही जनरेटर की बदौलत चल पाते हैं। ऐसे में पसीना मरीजों में जानलेवा संक्रमण तक कारण बन सकता है। अन्य वार्डों में भर्ती मरीजों की दयनीयता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यही नहीं, बिजली जाने से ऑपरेशन थियेटर के भी आधे एसी बंद हो जाते हैं।
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अकस्मात बिजली गुल होने का खामियाजा एमआरआई, सीटी स्कैन आदि मशीनों को भी भुगतना पड़ता है। करोड़ों की इन मशीनों की वार्षिक मरम्मत के मद में ही कई करोड़ खर्च होते हैं। एकदम बिजली गुल होने से इनके उपकरणों और जांच की गुणवत्ता तक पर फर्क पड़ता है। इन मशीनों का एक-एक छोटा उपकरण कई लाख रुपये में आता है। तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार निर्बाध बिजली न मिलना आए दिन यहां जांच मशीन खराब होने का एक बड़ा कारण है। इस मुद्दे पर मेडिकल कॉलेज के आला अधिकारी गोल मोल जवाब देेते रहते हैं।
50 लाख में ही हो सकती स्वतंत्र फीडर की व्यवस्था
बिजली विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने बताया कि स्वतंत्र फीडर डालने में कोई बड़ी अड़चन नहीं है। मेडिकल कॉलेज को इच्छा शक्ति दिखानी होगी। दुनारा स्थित ट्रांसमिशन सबस्टेशन से मेडिकल कॉलेज तक करीब दस किलोमीटर स्वतंत्र फीडर लाना होगा। औसतन एक किलोमीटर में 16 से 17 खंभे लगते हैं। पूरी प्रक्रिया में लगभग 50 लाख रुपये खर्च आएगा। इसके बाद हमेशा के लिए बिजली की समस्या से मेडिकल कॉलेज को छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन पहल तो मेडिकल कॉलेज अमले को ही करनी होगी।
ये भी जान लें
- औसतन सालाना आठ करोड़ रुपये बजट मिलता है मेडिकल कॉलेज को दवाओं, ऑक्सीजन, रसायन आदि के मद में।
- एमआरआई, सीटी स्कैन, डिजिटल एक्सरे आदि की मरम्मत के लिए एनुअल मेनटेनेंस कांट्रैक्ट (एएमसी) के तहत मिलते हैं 12 करोड़।
- पिछले वर्ष वार्षिक मरम्मत के मद में एक करोड़ अतिरिक्त बजट मिला था।
- मेडिकल कॉलेज में वर्ष में कम से कम 325 घंटे होती है बिजली कटौती ।
‘वार्ड में चार एसी लगे हैं। बिजली जाते ही सभी बंद हो जाते हैं। इसके बाद यहां भर्ती मरीजों को शरीर में जो जलन महसूस होती है वह बर्दाश्त नहीं होती’
रोहित, मरीज बर्न वार्ड
‘बिजली जाते ही वार्ड के आधे पंखे तक बंद हो जाते हैं। ऐसी गर्मी में हमारे ऊपर या अन्य गंभीर मरीजों पर क्या गुजरती है उसे बयां नहीं किया जा सकता ’
दीपक, मरीज मेडिसिन वार्ड
‘मेडिकल कॉलेज के लिए स्ततंत्र फीडर बेहद आवश्यक है। कुछ जगह के लिए इनका विशेष इंतजाम कराया जा रहा है। झांसी मेडिकल कॉलेज की क्या स्थिति है इस संबंध में सटीक जानकारी मैं आपको सोमवार को उपलब्ध करा सकूंगा’
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डॉ. केके गुप्ता, महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा
‘यह सही है कि बिजली गुल होने से मरीजों की समस्या और चिकित्सा सेवाओं की चुनौती बढ़ जाती हैं। मेडिकल कॉलेज की बिजली व्यवस्था देख रहे अवर अभियंता को इस संबंध में पुरानी फाइल देखने और स्वतंत्र फीडर के लिए नया खाका तैयार करने के निर्देश दिए हैं।’
डॉ.साधना कौशिक, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज झांसी
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