झांसी। आवास विकास स्थित किड्स स्कूल में ललित कला अकादमी की ओर से तीन दिवसीय चितेरी कला कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
उत्तर प्रदेश ललित कला अकादमी की ओर से मंगलवार को आयोजित चितेरी कला कार्यशाला में वरिष्ठ चितेरी कलाकार काशीराम ने प्रतिभागियों को रेखाएं खींचना, रंगों का समावेश आदि के बारे में बताया। इस दौरान चितेरी कला की खूबियों से लैस मानव चेहरा, बुंदेली पजामे पहने व्यक्ति, पेशवाई एवं बुंदेली पगड़ियां बांधे रमतूला बजाते पुरुष, विदाई पालकी में बैठी नवविवाहिता एवं बेल बूटियों, फू लकारी का चित्रांकन प्रतिभागियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा।
चित्रकार कामिनी बघेल ने बताया कि चितेरी कला को मराठा युग में विशेष पहचान मिली, लेकिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद चितेरी कला मंदिरों, महलों से हटकर लोगों के घरों की दीवारों तक सिमट कर रह गई। चितेरी कला में सधे अभ्यास एवं रंगों के सही उपयोग से एक मिनट में सामान्य आकार क ा चित्र दीवार पर चित्रित हो सकता है। बताया कि भले ही इस कला को मधुबनी, कांगड़ा, मारवाड़ी, मुगल शैली की चित्रकारी की तरह ख्याति नहीं मिली हो, लेकिन अब युवा इस पर शोध कर रहे हैं।
वरिष्ठ चित्रकार किशन सोनी ने बताया कि चितेरी कला को बुंदेली कलम भी कहते हैं और इस कला में राम कथा क ो खासा महत्व मिला है, जो झांसी, ओरछा, दतिया के महलों व मंदिरों में देखी जा सकती है। इस मौके पर विकास वैभव, प्रेम कुमार गौतम, राज किशोर बोहरे, कुंती हरीराम समेत करीब 60 बच्चों ने चितेरी कला के बारे में जानकारी हासिल की।
वनस्पतियों से तैयार होते थे रंग
चिकनी सतह पर तूलिका से चित्रांकन चितेरी कला की विशेष पहचान मानी जाती है। इसके रंगों को बनाने के लिए वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता था। जहां गेंदे से पीला रंग बनता था तो चुकंदर से लाल, टेसू से गुलाबी, हल्दी से पीला, चूने से सफेद, पलाश से नीला रंग बनाकर प्रयोग में लाया जाता था। वर्तमान में फ्लोरा सेंट पाउडर को गोंद अथवा फेवीकोल में मिलाकर रंग तैयार किए जाते हैं।
चितेरी कभी छाई थी मंदिरों व महलों में
बुंदेली चितेरी अमूमन नगर के समस्त मंदिरों एवं महलों में चित्रित होते थे। कभी शहर स्थित रघुनाथ जी मंदिर में राजा गंगाधर राव, महारानी लक्ष्मीबाई सहित अन्य राजाओं के चित्र अंकित थे, जो इतिहासकारों की पुस्तक में जगह बना चुके हैं, वहीं आज इस पुरातन कला की विशेषता रानी महल, छनिया पुरा स्थित गुसाईं शिव मंदिर, गंगाधर राव की समाधि, किले स्थित बाराद्वारी व अन्य स्थलों में देखी जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार चितेरी में बुंदेली शैली के अलावा मुगल एवं मराठा प्रभाव भी देखने को मिलता है।