झांसी। बुंदेलखंड की धरती पर निरंतर बह रही धसान नदी पर भी पूर्वजों का श्राद्ध - तर्पण करने की प्राचीन परंपरा रही हैं। इस नदी को दशार्ण भी कहा गया है, जो बुंदेलखंड का प्राचीन विख्यात नाम है। पौराणिक ग्रंथों मार्कंडेय, वायु पुराण आदि में इस नदी का विशेष उल्लेख किया गया है। माना जाए तो दशार्ण का महत्व गंगा नदी से कम नहीं है।
मध्य प्रदेश में रायसेन जिले के पर्वतों से निकली धसान नदी का बुंदेलखंड के लोगों के जीवन में अहम महत्व रहा है। कई प्राचीन सभ्यताएं इसी नदी के तट के आसपास पनपी है और विकसित भी हुई है। इस नदी का धार्मिक एवं सामाजिक महत्व भी हमेशा से रहा है। इसका उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त है। इनमें कालिदास का मेघदूतम भी प्रमुख है। मार्कंडेय पुराण में इसे दशार्ण नदी कहा गया है। वहीं, वायु पुराण में उल्लेख है, कि वाराणसी, नैमिषारण्य, दशार्णा, और कालंजर में श्राद्ध का अनुष्ठान करना चाहिए। पौराणिक महत्ता के चलते प्राचीन काल से ही ग्रामीण अंचलों के कई परिवार श्राद्ध तर्पण इस नदी के तट पर करते आए है। हालांकि अब आवागमन के संसाधन विकसित हो जाने से अधिकांश परिवार प्रयागराज, हरिद्वार, गयाजी के लिए रूख कर लेते हैं। ऐसे में इस पावन नदी के तट पर श्राद्ध तर्पण की परंपरा धीरे - धीरे लुप्त होती जा रही हैं।
कभी दशार्ण के नाम से जाना जाता था बुंदेलखंड
प्राचीन भारत में स्थान विशेष का नाम पर्वत अथवा नदियों के नाम पर होने की परंपरा रही है। धसान नदी का प्राचीन नाम दशार्ण है। इसी नाम से कभी बुंदेलखंड को दशार्ण देश के नाम से जाना जाता था। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एसके दुबे ने बताया कि कभी बुंदेलखंड को दशार्ण देश के नाम से जाना गया है। इसमें बुंदेलखंड व विदिशा का क्षेत्र शामिल था। एरच से दशार्णाधिपति के नाम से मुद्रा मिली है। रायसेन जिले से यह नदी सागर, टीकमगढ़, ललितपुर, छतरपुर, झांसी से होकर बेतवा नदी में मिल जाती है। इसे बेतवा की सहायक नदी भी कहा जाता है। हालांकि धसान में सुखनई सहित कुछ छोटी नदियां भी मिलती है।
धसान का हो चुका है पुरातत्व सर्वे
धसान नदी की घाटियों एवं तट के आसपास पाषाण काल से लेकर मौर्य युग तक के पुरातत्व प्रमाण मिले है। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एस के दुबे ने बताया कि दशार्ण नदी के आसपास घाट कोपरा, विरगुवां, देवरी, इमलौटा आदि ग्रामीण इलाकों में प्राचीन बस्तियों और ग्रामीण अंचल मारकुआं, इमलौटा, खेड़ों आदि घाटी वाले इलाकों में मनुष्यों के खेती करने के प्रारंभिक दौर के प्रमाण मिले है। इसके अलावा प्रतिहार, चंदेल काल के मंदिर, मूर्तियां प्राप्त हुई है। उनके अनुसार धसान का पौराणिक एवं पुरातात्विक महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इस नदी के तट पर ध्यान व तर्पण करने से मनुष्य दस ऋणों से मुक्त होता है। उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में इस नदी का पुरातत्व सर्वे हो चुका है। इस नदी के तट के आस पास कई पुराने टीले मिले है, जिनमें प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिल सकते है।
पूर्वजों को तर्पण, श्राद्ध आदि का कार्य नदी के तट पर ही होना चाहिए। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं। यह तर्पण धसान और बेतवा नदी पर भी दिया जा सकता है। इसका पौराणिक महत्व है।
महंत विष्णु दत्त स्वामी