नर्सिंग होमों में पांच सौ और हजार के नोट स्वीकार नहीं किए जाने से मरीज के तीमारदारों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। भुगतान चेक के जरिये लिए जा रहे हैं। फुटकर खर्चों के लिए मरीजों के तीमारदार 100 और अन्य छोटे नोटों का इंतजाम बैंक के जरिये कर रहे हैं। हालांकि, कुछ बड़े मेडिकल स्टोर वाले पांच सौ व हजार के नोट लेकर अवश्य देकर मरीजों को राहत देने का काम कर रहे हैं।
शनिवार को अमर उजाला के संवाददाता ने मेडिकल कॉलेज गेट नंबर दो के सामने स्थित चार नर्सिंग होमों में का जायजा लिया। बड़ागांव क्षेत्र के ग्राम मुराटा निवासी बालकिशन अहिरवार ने बताया कि उनका बेटा डेंगू से पीड़ित है। पिछले छह दिन से नर्सिंग होम में है। हर दूसरे दिन काउंटर पर उनको भुगतान जमा करने को कहा जाता है। पांच सौ और हजार के नोट काउंटर पर स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। इस कारण उनका पूरा दिन बैंक की कतार में लगने में जाया हो जाता है।
लगभग हर नर्सिंग होम का यही हाल है। मरीज बेहाल हैं लेकिन नर्सिंग होम प्रबंधन पांच सौ और हजार के नोट लेने को तैयार नहीं है। नर्सिंग होम चेक के जरिए भुगतान ले रहे हैं। जिन मरीजों के पास रुपये नहीं है, उनसे छुट्टी के समय चेक लिया जा रहा है। दूसरी तरफ कुछ बड़े मेडिकल स्टोरों में पांच सौ और हजार के नोट स्वीकार कर रहे हैं। इससे किसी हद तक राहत है। दरअसल पूरे बुंदेलखंड से लोग इलाज के लिए झांसी आते हैं। ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र के होते होते हैं। नर्सिंग होम प्रबंधन इस बारे में कुछ बताना तो दूर, बात करने तक को तैयार नहीं है।
बड़ी मुसीबत है
बरुआसागर के ग्राम मकारा निवासी प्रमोद ने बताया कि वह इलाज के लिए झांसी आए थे। घर से पांच सौ और हजार के नोट लेकर चले थे। मेडिकल स्टोर वाले नोट लेने को तैयार नहीं है। इस कारण वे बिना दवाओं के ही घर वापस जा रहे हैं।
कड़ाई की जाए
ओरछा गेट निवासी विशाल का कहना है कि केंद्र सरकार ने सरकारी अस्पतालों में पांच सौ व हजार के नोटों को स्वीकार करने के आदेश दे रखे हैं। हकीकत तो यह है कि सरकारी अस्पतालों में तो इलाज सस्ता है। वहां अमूमन बड़े नोटों की जरूरत नहीं पड़ती। मरीजों की दिक्कतों को देखते हुए निजी अस्पतालों के लिए आदेश जारी किए जाने चाहिए।
नरमी बरतें निजी अस्पताल
यह सही है कि निजी अस्पतालों के लिए हजार और पांच सौ नोट स्वीकार करने का कोई आदेश नहीं है। इसके इतर उन्हें संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए। मेरा निजी अस्पतालों के प्रबंधन से आग्रह है कि वे नरमी बरतें। रुपये के लिए किसी का इलाज नहीं रोकें।
डॉ.विनोद यादव
मुख्य चिकित्साधिकारी