झांसी। कोरोना महामारी में संक्रमितों का इलाज करने में जितना योगदान डॉक्टरों का रहा, उतनी ही मेहनत नर्सों ने भी की। शुरू में नर्स कोविड रोगियों का इलाज करने में डरीं जरूर मगर अपने कदम पीछे नहीं खींचे। इसी वजह से कई मरीजों की जान भी बच पाई।
नर्सिंग को दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य पेशे के रूप में माना जाता है। जब डॉक्टर दूसरे रोगियों को देखने में व्यस्त होते हैं, तब रोगियों की 24 घंटे देखभाल करने के लिए नर्सेस उपलब्ध रहती हैं। कोरोना काल में नर्स मरीजों को ठीक करने में दिन रात जुटी रहीं। नर्सेस कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनीं। उन्होंने अपने परिवार की चिंता नहीं की। विश्व नर्सेस दिवस पर कुछ ऐसे ही नर्सेस के उदाहरण आपके सामने हैं।
नर्स शर्ली ने पहली कोरोना मरीज की देखरेख की
झांसी। मेडिकल कॉलेज में जब ओरछा गेट अंदर की रहने वाली पहली कोरोना मरीज पहुंची तो पूरा स्टाफ दहशत में था। मरीज के पास जाने की सोचकर सभी डरे हुए थे। स्टाफ नर्स शर्ली जॉन की ड्यूटी मरीज की देखरेख के लिए लगाई गई। शर्ली ने बताया कि उनके परिवार में बुजुर्ग सास-ससुर और नानी व माता-पिता हैं। उनके बारे में सोचकर मन घबराता था। फिर सोचा कि रोगी का इलाज तो करना ही है। इसके बाद कोविड वार्ड में दाखिल हो गई। मास्क, पीपीई किट, ग्लव्स पहनकर पूरी सुरक्षा के साथ रोगी का इलाज करती रहीं। जबकि, 10-12 दिन तक कोई दिक्कत नहीं हुई तब जाकर मन से डर निकला।
पूरे स्टाफ की ड्यूटी लगवाई, सबका मनोबल ऊंचा रखा
झांसी। कोरोना काल में जब सभी स्टाफ कोविड वार्ड में ड्यूटी करने से बच रहे थे, तब उनका मनोबल ऊंचा रखने का काम मेडिकल की मेट्रन रानी वर्मा ने किया। वह सभी नर्सेस से कहती रहीं कि ये महामारी इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली है। मरीजों का इलाज का भार तो नर्सिंग स्टाफ पर है। लोगों को हमसे उम्मीदें हैं। पूरे प्रोटेक्शन के साथ ड्यूटी करोगे तो कुछ नहीं होगा। ऐसा करके उन्होंने सभी नर्सिंग स्टाफ को मना लिया। शिफ्ट के हिसाब से सभी नर्सेस की ड्यूटी लगाई। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में सभी नर्सेस से पूरी मेहनत से ड्यूटी की। इस वजह से कई गंभीर रोगियों की भी जान बच सकी।
बीपी, डायबिटीज होने के बाद भी कराई पहली संक्रमित की डिलीवरी
झांसी। मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स अर्चना पाठक ने झांसी में पहली कोरोना संक्रमित गर्भवती महिला की डॉक्टर व स्टाफ की मदद से डिलीवरी कराई। उन्होंने बताया कि वह खुद बीपी और डायबिटीज की मरीज हैं। इसके बावजूद जब उनकी ड्यूटी कोरोना पॉजिटिव महिला की डिलीवरी कराने के लिए लगाई गई तो उन्होंने मना नहीं किया। हालांकि, डर लग रहा था। मगर मन मजबूत करके अपनी ड्यूटी की। बाद में 14 दिनों के लिए क्वारंटीन भी रहीं।
जब अपने दूर भाग रहे थे, तब 12-12 घंटे तक की
झांसी। जिला अस्पताल की स्टाफ नर्स शकुंतला देवी गुप्ता ने कोरोना काल में 12-12 घंटे की ड्यूटी की। उन्होंने कहा कि कई लोग अस्पताल में भी कोरोना संक्रमितों को देखने के लिए नहीं आते थे। ऐसे में उन्होंने मरीजों का न सिर्फ इलाज किया, बल्कि उन्हें ये भरोसा भी दिलाया कि वो जल्द ही ठीक हो जाएंगे। बताया कि काम करके करते नींद भी आने लगती थी, मगर वो झपकी तक नहीं लेती थीं। हर समय लगता था कि कहीं किसी मरीज को कोई दिक्कत न हो जाए।
नर्सों ने कहा-ये मांगें पूरी हों
- पद नाम बदला जाए। स्टाफ नर्स की जगह नर्सिंग ऑफिसर और सिस्टर इंचार्ज की जगह सीनियर नर्सिंग ऑफिसर कहा जाए।
- वर्दी समेत विभिन्नि भत्तों की मांग 2006 से की जा रही है। कहा कि इससे हर महीने 12 से 15 हजार रुपये कम हो रहे हैं।
- करीब 15 साल बाद 2020 से नर्सेस का प्रमोशन हुआ था। इसके बाद से फिर नहीं हुआ। जबकि, ये नियमित होना चाहिए।
- कई पद रिक्त हैं और नई नियुक्तियां नहीं हो रहीं। 3 आईसीयू बेड पर एक नर्स का मानक है। मेडिकल कॉलेज में 16 बेड के आईसीयू पर दो नर्स होती हैं।