झांसी। कभी गर्मियों की छुट्टियों में परंपरागत खेल कंचा, पतंग बाजी, जूड़ों, सांप सीढ़ी अष्टा चंगा, आइस - पाइस का बच्चों की दुनिया में खासा महत्व था, लेकिन मोबाइल - कंप्यूटर युग के परिवेश में यह खेल लुप्त हो रहे हैं। बच्चे अब मोबाइल एवं टेलीविजन की दुनिया में खोते जा रहे हैं।
अधिकांश बच्चों के शरीर पर पसीना की बूंदें अब नहीं दिखतीं, क्योंकि वह घरों में ही कैद होकर रह गए हैं। व्हॉटसअप के फोटो मैसेज का आदान प्रदान, मोबाइल की स्क्र ीन पर रेसिंग रोड, टेंपिल रन, शब्बे सफ, कट कट द रोप फ्री, फ्लू पी क्यू, निंजा जंप, मोटर साइकिल रेस बच्चों को शारीरिक श्रम करने का मौका ही नहीं दे रही है। रही सही कसर टेलीविजन कर दे रहा है।
कभी कॉमिक्स की दुनिया में मोटू पतलू के चित्र एवं संवाद पढ़ने को बच्चे लालायित रहते थे, लेकिन अब टीवी स्क्रीन पर चलते फिरते मोटू पतलू हिलने का मौका ही नहीं दे रहे हैं। हालांकि परंपरागत खेलों के गुम होने की वजह नगरीय क्षेत्रों में जगह की कमी भी है।
13 वर्षीय अभय अग्रवाल कहते हैं कि पहले मुहल्लों में कंचा, गिल्ली डंडा आदि खेलने के लिए जगह होती थी, लेकिन अब नहीं है। वहीं यह खेल बीते जमाने के भी हो गए हैं।
कक्षा तीन की छात्रा अग्रिमा पांडेय के अनुसार स्कूल से ही गर्मियों की छुट्टियों का इतना होमवर्क मिलता है, कि समय नहीं है कोई खेल खेलने का। जब समय मिलता भी है तो मोबाइल पर गेम खेलना ज्यादा अच्छा लगता है।
12 वर्षीय प्रिंस के मुताबिक न तो अब कंचे , गिल्ली डंडा व पतंग गली मुहल्ला में मिलती हैं और न ही कोई प्रोत्साहित करता है इन्हें खेलने के लिए। रही बात कॉमिक्स की तो स्कूल से यह पुस्तकें उपलब्ध हो जाती हैं।
पतंग की दुनिया भी सिमटी बाजार में
कभी शहर स्थित बिसाती बाजार में पतंगों की श्रृंखलाबद्ध दुकानें थीं, जो अब मात्र एक - दो दुकान में सिमट कर रह गई हैं। वहीं कॉमिक्स की भी गिनी चुनी दुकानें हैं। सदर बाजार स्थित पुस्तक विक्रेता गिरीश दीवान के मुताबिक कॉमिक्स की बिक्री अब मात्र 5 से 10 प्रतिशत तक रह गई है।