झांसी। हाईकोर्ट के आरक्षण नियमावली खारिज कर दिए जाने के बाद पंचायत चुनावों के लिए तय हुए आरक्षण में फेरबदल करना होगा। हाईकोर्ट ने वर्ष 1995 के बजाए अब वर्ष 2015 को आधार वर्ष बनाते हुए आरक्षण तय करने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में अभी आरक्षित सीटों का उलट-पलट होना तय है। नई आरक्षण सूची 27 मार्च तक तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में पदों के आरक्षण के लिए सरकार ने 11 फरवरी 2011 को शासनादेश जारी किया था। इसके जरिए वर्ष 1995 को आधार वर्ष बनाते हुए चक्रानुक्रम रीति से आरक्षण तय करने के निर्देश दिए गए। इसके आधार पर पंचायती राज विभाग ने 12 फरवरी को सभी वर्गों के प्रतिशत के मुताबिक आरक्षित पदों की संख्या तय कर दी। झांसी में जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट अनुसूचित जाति के खाते मेें चली गई जबकि ग्राम प्रधान की 496 सीटों में अनुसूचित जनजाति (महिला) को एक, अनुसूचित जनजाति को एक, अनुसूचित जाति (महिला) को 43, अनुसूचित जाति को 77, पिछड़ा (महिला) 47, पिछड़ा को 86, महिला 76 एवं सामान्य वर्ग को 165 सीटें आवंटित हुईं।
शासन से सीटों की संख्या तय होने के बाद जिलाधिकारी ने 2 मार्च को इनके आधार पर स्थान आरक्षित कर दिए। सीट आरक्षित होने के बाद गांवों में चुनावी हलचल तेज हो गई। उधर, इन आरक्षित सीटों पर आपत्तियां निस्तारित करते हुए 15 मार्च तक अंतिम सूची प्रकाशित होनी थी लेकिन, इसके पहले मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने भी आधार वर्ष ठहराने को गलत बताते हुए इसे 2015 के आधार पर तय करने को कहा है। आधार वर्ष बदल जाने से अब पहले तय हुई सीटों का पूरा समीकरण ही बदल जाएगा। इन सभी सीटों को नए सिरे से आरक्षित करना होगा। यह काम 27 मार्च तक पूरा करना होगा।
नए शासनादेश का इंतजार किया जा रहा है। शासनादेश में जिन प्रावधानों का उल्लेख रहेगा, उसके मुताबिक नए आरक्षित स्थान तय होंगे।
जगदीश राम
डीपीआरओ
पानी की तरह बहा चुके पैसा, अब बढ़ी धड़कनें
पंचायत चुनाव में किस्मत आजमाने के लिए उम्मीदवारों ने गांव-गांव घूमना शुरू कर दिया था। जिन उम्मीदवारों को अंतरिम आरक्षण में ही अपने मनमुताबिक सीट मिल गई, उन्होंने पैसा भी पानी की तरह बहाना शुरू कर दिया। दूसरे उम्मीदवारों से आगे रहने के लिए इन नेताओं ने आरक्षण की अंतिम सूची का भी इंतजार नहीं किया। यही बेसब्री अब उनको भारी पड़ने जा रही है।
चुनावी तैयारियों में प्रधान एवं जिपं पद उम्मीदवार सबसे आगे हैं। मतदाताओं को साधने के लिए गांवों में इनकी ओर से मुर्गा-दारू पार्टियां का दौर शुरू हो गया। जगह-जगह वॉल राइटिंग कराने के साथ घोड़ा-गाड़ी का भी इंतजाम कर लिया गया लेकिन, ऐन टाइम पर हाईकोर्ट के निर्णय ने उनके मंसूबे पर पानी फेर दिया। अब नए सिरे से आरक्षण की बात सुनकर उनके होश उड़े हुए हैं। वर्ष 2015 के आधार पर अगर उनकी सीट का आरक्षण बदला तब उनका अभी तक खर्च हुआ पैसा का मिट्टी में मिलना तय है। ऐसे में हाईकोर्ट के आज के फैसले पर इन उम्मीदवारों की सबसे अधिक निगाहें थीं। विकास भवन पहुंचकर भी तमाम उम्मीदवार नए आरक्षण की स्थिति जानने की कोशिश करते रहे।
खुद की गलती बनी वरदान
आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने उसे पलट दिया लेकिन, इससे सरकार को काफी राहत मिली है। सरकार पहले भी किसान आंदोलन आदि को देखते हुए पंचायत चुनाव टालने की फिराक में थी लेकिन, हाईकोर्ट के डंडे की वजह से मजबूरन उसे तैयारियां करनी पड़ रही थी। अब सरकार की अपनी गलती ही उसके लिए वरदान साबित हुई। अधिकारियों का कहना है कि सरकार मई तक ही चुनाव कराना चाहती थी।