झांसी। लॉकडाउन और कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे के बीच भी समाज के कई वर्ग अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन करते रहे। इन्हीं में से एक हैं समाचार पत्र अभिकर्ता। विपरीत परिस्थितियों में भी हमेशा की तरह सूरज उगने से पहले उनका सफर शुरू हो जाया करता था और समाचार पत्र की आखिरी प्रति बांटने तक वे अपने काम में जुटे रहते थे। पूरी सतर्कता के साथ वे लगातार अपने काम को अंजाम देते रहे। हालात सामान्य होने और अब फिर एक बार खतरा बढ़ने के बाद भी समाचार पत्र अभिकर्ता अपनी सेवाएं समाज के सच्चे प्रहरी बनकर बदस्तूर जारी रखे हुए हैं।
लॉकडाउन के दरम्यान सुबह सड़कों पर एकदम सन्नाटा पसरा रहता था। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता था। लेकिन, हमें तो अपना काम करना ही था। पूरी जिम्मेदारी के साथ लोगों तक समाचार पत्र पहुंचाते रहे।
- मनोज राय
कोरोना मरीज होने पर कई मुहल्लों के रास्ते बल्लियां लगातार रोक दिए गए थे। लेकिन, हमें तो अपना काम करना था। साइकिल दूर खड़ी कर पैदल ही घर-घर जाकर अखबार बांटकर आ जाते थे। भूल नहीं सकते वो दिन।
- मोहित राय
परिवार के लोग बेहद चिंतित रहते थे। उन्हें भय रहता था कि कहीं हम महामारी की चपेट में न आ जाएं। लेकिन, खुद को सुरक्षित रखने के लिए हम पूरा ख्याल रखते थे।
- पंकज राय
जीवन में कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी वक्त आएगा। सन्नाटे में केवल हमारी ही साइकिल नजर आती थी। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता थी। लेकिन, हम भरोसे के साथ अपने काम को अंजाम देते रहते थे।
- योगेश
अचानक परिस्थितियां एकदम विपरीत हो गईं थीं। सभी डर और आशंकाओं के साए में जी रहे थे। हमारे परिजन भी डरते थे। काम बंद करने तक की बात कह देते थे। लेकिन, उन्हें समझाकर हम आगे बढ़ जाते थे।
- आशीष कोष्टा
लॉकडाउन के दरम्यान एकदम नई परिस्थितियों से सामना करना पड़ा था। कभी पुलिस रास्ता रोकती थी, तो कभी बैरियर सामने आ जाते थे। लेकिन, हमें तो अपना काम करना ही था। आखिर आजीविका भी तो हमारी यही थी।
- रवि वर्मा