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नौ नहीं इस बार दस दिन के लिए आएंगी मां दुर्गा

Thu, 22 Sep 2016 12:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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nvdurga, jhansi news - फोटो : amar ujala, jhansi news
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झांसी। एक अक्तूबर से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्र में इस बार जगदंबे मां का दरबार दस दिन तक सजेगा। द्वितीया तिथि दो दिन तक होने के कारण ऐसा होगा। 11 अक्तूबर को दशहरा का पर्व मनाया जाएगा।
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आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा शनिवार एक अक्टूबर से शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो जाएंगे। द्वितीया की तिथि दो दिन रविवार व सोमवार होने सेे नवरात्र दस दिन मनाया जाएगा। महंत विष्णुदत्त स्वामी के मुताबिक सूर्य सिद्धांत से पंचांग में तिथियां घटती बढ़ती रहती है। इस वर्ष संवत 2073 में शारदीय नवरात्र में द्वितीया तिथि बढ़ी है। इससे पूर्व 1998 में यह स्थिति रही रही, तब दस दिन नवरात्र मनाया गया था 11 वें दिन विजयादशमी पर्व। उनके अनुसार इस वर्ष भी मां दुर्गा का पूजन पूरे 11 दिन किया जाएगा।

उनके अनुसार नवरात्र पर तिथि बढ़ने से देश का सम्मान तो विश्व पटल पर बढे़गा और शत्रु पर जीत हासिल होगी, लेकिन देश में आंदोलनों के चलते उथल-पुथल काफी रहेगा। लेकिन, स्थिति नियंत्रण में रहेगी। शारदीय नवरात्र मां जगदंबे की आराधना का पर्व है। घट स्थापना कर पूजा करने से मां की विशेष कृपा रहती है।  
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देवी मंदिरों में होंगे अनुष्ठान, लगेंगे मेेले
नवरात्र पर जगह-जगह मां अंबे की प्रतिमाएं स्थापित होगी। देवी मंदिरों में अनुष्ठान होंगे और भक्त हर बार की तरह अपनी मन्नतें पूरी करने के  लिए मां से विनती करेंगे। नवरात्र के दिनों में देवी मंदिरों में मेला भी लगेगा।

सुबह तड़के से जलाभिषेक को उमडे़ंगे श्रद्धालु
पंचकुइयां मंदिर में मां शीतला के दर्शन एवं जलाभिषेक के लिए सुबह तड़के से ही श्रद्धालु उमड़ने लगते है। मानते है पिछले दो शताब्दियों से मंदिर क्षेत्र में मेला लगता आ रहा है। सुहागिन स्त्रियों का यहां सिंदूर खरीदना विशेष शुभ मानते है। पांच कुआं मंदिर के समक्ष होने से मंदिर पंचकुइयां मंदिर कहा जाने लगा। 

महाकाली करेगी मनोकामनाएं पूरी
लक्ष्मी तालाब के तट पर महाकाली मंदिर ज्योतिष व तंत्र का विशेष केंद्र है। गर्भगृह में महाकाली जी प्रतिमा विराजमान है। प्राकृतिक सुंदरता व आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे मंदिर में इंदिरा गांधी अपनी मनोकामना के लिए आयी थी। यहां शारदीय नवरात्र पर सुबह तड़के से ही आरती, अभिषेक एवं धार्मिक कार्यक्रम प्रारंभ हो जाते है।

महालक्ष्मी में जलाएं दीप
लक्ष्मी तालाब के तट पर ही मराठा काल में निर्मित महालक्ष्मी मंदिर है। कहते है कि रानी लक्ष्मीबाई प्रत्येक शुक्रवार को मंदिर में पूजा अर्चना करती थी और लंबे समय तक मंदिर प्रबंधन खुद सम्हाला था। मंदिर परिसर में मौजूद दीप स्तंभ पर कभी 24 घंटे दीप जला करता था। आज भी नवरात्र पर यहां महालक्ष्मी के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहां दीप जलाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

चंदेल कालीन है कैमासन मंदिर
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की पहाड़ी पर कैमासन देवी का मंदिर है, जिसे कामाक्षा देवी का मंदिर कहते है। इसे चंदेल कालीन माना जाता है। इसी मंदिर से लगी दूसरी पहाड़ी पर मैमासन देवी का मंदिर है। दोनों मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नवरात्र के नौ दिनों में यहां विशेष अनुष्ठान किए जाते है।

आल्हा ऊदल ने स्थापित किया था लहर की देवी मंदिर
सीपरी में लहर की देवी मंदिर का भी अपना विशेष स्थान है। मान्यता है कि बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा ऊदल ने इस मंदिर की स्थापना में अपना योगदान दिया था। वर्तमान में आस्था का बड़ा केंद्र बन चुके इस देवी मंदिर में हजारों की संख्या में प्रतिदिन श्रद्धालु मां के दर्शन को आते है। नवरात्र में मंदिर क्षेत्र मेला के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
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